Tuesday, February 1, 2011

चाहत

फर्जी दलीलें अभी

तक जिन्दा हैं वकालतनामे के साथ

गवाह बिकना चाहता है बार-बार

मुजरिम अपने

गुनाह पर शर्मिन्दा नही बेचैन है

और फख्र के साथ कहता है

मेरी बर्बादी का ताल्लुक

उसकी सोहबत से है

मुंसिफ बदलते जा रहें है

मुकदमे की तारीख की तरह

रहबर तब्सरा कर रहे है

और रहजन तनकीद

ऐसे दिलचस्प माहौल में

उसने कहा क्यों न आप

कल की बात करें

मैं समझ नही पाया

बीता हुआ कल या आने वाला कल

ये फर्क मिट जाता

तो दिल की कसक को

तसल्ली होती

और वो बेरंग शाम में

होश जदा रहने की ख्वाहिश

करता मय,मीना और साकी

से यह गुजारिश करता कि

अब वह जीना चाहता है

कल,आज और कल के लिए नही

बल्कि उसके लिए

जिसने उसको बर्बाद किया

अपनी शर्त पर...।

डा.अजीत

4 comments:

ज्योति सिंह said...

अब वह जीना चाहता है कल,आज और कल के लिए नही बल्कि उसके लिए जिसने उसको बर्बाद किया
अपनी शर्त पर.
kitni ajeeb baat hai ,hamari bhavnaaye nasht ho rahi hai ,ati uttam .

ana said...

बहुत सुन्दर ..........सत्य को खोलकर रख दिया ........शुभकामनाये

संजय भास्कर said...

बहुत बहुत प्यारी कविता एकदम कमसिन सपनो जैसी. खूबसूरत ,कोमल ,निश्छल...

संजय भास्कर said...

सुंदर मनोभावों का सुंदर चित्रण।