Sunday, February 11, 2018

एकबार

मुझे तुम्हारे गले लगना था
एकबार
ताकि मैं बांच सकूं
नदी की तलहटी से
लौटते हुए बंसत के खत

और सुना सकूं
हवा को धरती की धूल के
दो प्यार भरे गीत

मुझे तुम्हारे गले लगना था
एकबार
ताकि मैं स्वप्न को बचा सकूं
नींद के सघनतम आलोक और
भोर की भूल से

मुझे तुम्हारे गले लगना था एकबार
यह कथन कोई मलाल नही
फिर यह क्या है
तुम बेहतर समझती हो

नींद की बड़बड़ाहट की तरह
मैं दोहराना चाहता हूँ यह बार-बार
मुझे तुम्हारे गले लगना था
एकबार।

©डॉ. अजित

4 comments:

सुशील कुमार जोशी said...

सुन्दर

Meena Sharma said...

बहुत सुंदर

Priyanka singh said...

हृदयस्पर्शी

Priyanka singh said...

हृदयस्पर्शी