Thursday, February 8, 2018

बसंतराग

बसंतराग
__

बसंत का रंग ग्रे है
पीले रंग का बसंत
अब केवल कविताओं में मिलेगा
जो मन राग की चासनी में डूबे हैं  
वो दृष्टिबंधन के भी है शिकार
वो बता सकते है
हर रंग को पीला
बसंत का रंग ग्रे है
ये बात मुझे उसने बतायी
जिसने कभी रंगो का किया था नामकरण.
**
बसंत पतझड़ की भूमिका है
 कह सकते है बसंत को
पतझड़ का पूर्व पाठ भी
बसंत पतझड़ को नही करता याद
और पतझड़ कभी भूल नही पाता
बसंत.
**
तुमनें कहा
हम इस बसंत में बिछड़ रहे है
तो फिर किस बसंत में मिलेंगे हम
मैंने कहा
बसंत के बिछड़े मिला करते है
केवल पतझड़ में.
**
धरती नाचती है बसंत में
आसमान रोता है बसंत में
दो एक साथ जब
नाचते और रोते है
तब आता है
असली बसंत.
**
कोई देता है उदाहरण
सुनाता है यह गीत
‘मन रे तू काहे न धीर धरे’
मैं बुदबुदाता हूँ
आँखों में एक नमी के साथ
‘शायद आ गया है फिर से बसंत’ .

© डॉ.अजित


2 comments:

सुशील कुमार जोशी said...

वाह

Priyanka singh said...

अहा .... ये बिछड़ना कल्पना
तो नहीं