Friday, September 24, 2010

धूप

ऐसा क्या कह दिया मैने

कि तुमने कुछ नही कहा

सिवाय उपेक्षाभाव के

बात हमारे बीच की थी

लेकिन तुमने तटस्थता का

अभिनय आखिर क्यों किया?

मेरा एकालाप कितना

अजीब था उस भीड मे

जिसमे तुम्हारा साथ

मेरे होने की पुख्ता वजह थी

अन्यथा मत लेना

लेकिन ऐसे मौको पर

जहाँ पर मै तुम्हारे समर्थन

का मोहताज़ रहा हूं

तुम्हारी अचरज़ भरी चुप्पी

मुझे कतई अच्छी नही लगती

तब हम और हमारे सम्बन्ध

एक कूटनीति की किताब

के बरखे बन बिखरने लगते है

यह अलग बात है कि

मैने कभी पूछा नही

लेकिन कभी-कभी मेरी

साधारण सी बात पर भी

तुम ऐसा दार्शनिक मौन

धारण कर लेती हो कि

मुझे डर लगने लगता है

समर्थन तलाशती मेरी हर बात

कितनी अकेली हो जाती है

तुम्हारे साथ होने पर भी

यह अलग बात है कि

मै छलबल से निकल आता

हूं उस संवाद से

लेकिन नही निकल पाता

तुम्हारे मौन के आतंक से

महीनो तक

अब तो एक अरसा बीत गया

अपनी बात पर तुम्हारी हामी सुनें

तुम तटस्थ जी सकती हो

ये अच्छी बात है

तटस्थ कैसे जीया जाता है

कैसे सीखा तुमने

मुझे बताना कभी फुर्सत में

आजकल तो तुम्हे फुर्सत है नही

देख रहा हूं

तुम्हे उलझते-सुलझते हुए

जैसे कोई स्वेटर बुन रहा हो

बिना नाप का

जाडे की धूप में...।

डा.अजीत

6 comments:

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

लेकिन नही निकल पाता

तुम्हारे मौन के आतंक से

महीनो तक...

जब समर्थन नहीं मिलता तो ऐसी ही पीड़ा का भाव होता है ...अच्छी अभिव्यक्ति

M VERMA said...

वैसे भी मौन का आतंक .. बहुत शोर करता है

संजय भास्कर said...

सार्थक और बेहद खूबसूरत,प्रभावी,उम्दा रचना है..शुभकामनाएं।

Apanatva said...

tatasthata sashakt hotee hai......
bahut khoob !

Sunil Kumar said...

अतिसुन्दर भावाव्यक्ति , बधाई के पात्र है

लीना मल्होत्रा said...

tumhare maun ka atank.. kaise jee leti ho tatasth hokar.. sahjta se kahi hui sundar abhivyaktiya. kavita me tevar hai.