Tuesday, September 28, 2010

असर

सपनों का मर जाना

उम्मीदों को उधार दे देना

और अपने आप से यह

पूछना ऐसा क्यों हुआ

ठीक वैसी बात है

जैसे त्योहारों की रौनक मे

उदासी का दबे पांव

दिल मे आ जाना

रात का बडा हो जाना और

दिन की दोपहरी मे

सो कर उठना

मन को खुशी चाहिए

या अपनापन

या फिर दोनो

ये तय करना था उसे

उस दिन जब

सब उल्लास मे डूबें हुए

अपने होने का जश्न मना रहें थे

मौसम बदल रहा है

मन का भी और शायद तन का भी

अब ऐसे मे

एक इंच मुस्कान के लिए

उसे तोडना होगा

खुद को

जोडना होगा अपने को

उस अपनेपन के ढोंग से

जो कभी भी कह देता है

मुझे माफ करो दोस्त..

अब मुझ से ये सब नही होता

अपने-पराये का नाटक

उसे चाहिए अब एक पूर्ण विराम

बिना सम्बोधन के...।

डा.अजीत

4 comments:

संजय भास्कर said...

सोचने को मजबूर करती है आपकी यह रचना ! सादर !

संजय भास्कर said...

"माफ़ी"--बहुत दिनों से आपकी पोस्ट न पढ पाने के लिए ...

Apanatva said...

sunder abhivykti tanhaaee ka aalam tabhee accha lagta hai jub aap khush nahee hai.vo hee samay
aisaa hai jub kuch accha nahee lagta......
bandhu khush rakhane ke ek doondoge to hazar bahane milenge....koshish to kariye.........

ab buzurgo se aise hee comment milenge..........
udasee mujhase kisee kee bhee dekhee nahee jatee.....rachanao me bhee.......
mai aisee hee hoo.:)

ज्योति सिंह said...

bahut sundar abhivyakti .asar ne asar daala .