Thursday, September 30, 2010

खामोशी

उसने चुनी खुद अपने लिए तन्हाई

कतरा कहे समन्दर से है प्रीत पराई

बात यही देर से समझ मे आई

रोशनी का फर्क नही कमजोर पड गई बिनाई

वो दूर रह कर जितना करीब था

नजदीकियां उतना फाँसला ले आई

वो ही मंसब का पता पूछता फिरा

जिसने थी कभी राह दिखाई

हौसलों का सफर उस दिन खत्म हुआ

नज़र से जब उसने नजर चुराई

अक्ल हुनर पे भारी पड गई

ऐब ने अक्सर जान बचाई

महफिल का अदब उससे पूछो

जिसने गैरो के यहाँ एक शाम बिताई...।
डा.अजीत

7 comments:

निर्मला कपिला said...

वो दूर रह कर जितना करीब था
नज़दीकियाँ उतना फासला ले आयी
बहुत खूब। अच्छी लगी आपकी रचना। शुभकामनायें

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

मंसब का पता पूछता फिरा
जिसने थी कभी राह दिखाई

बहुत सुन्दर ....अच्छा लगा आपको पढ़ना ..बाकी रचनाएँ फिर आ कर पढूंगी ...

आप अपने ब्लॉग पर फोलोअर का गजेट लगा लें तो आने में आसानी होगी ...या मुझे मेल कर दिया करें ...
sangeetaswarup@gmail.com

Apanatva said...

bahut gahree baate itnee sahjata aur saraltase abhivykt karana bade huner kee baat hai.

ज्योति सिंह said...

bahut khoobsurat ,aesa hi ho jaata hai ,ye jeevan hai is jeevan ka yahi rang roop ......

डॉ. हरदीप संधु said...

उसने चुनी खुद अपने लिए तन्हाई
कतरा कहे समन्दर से है प्रीत पराई.....
बिल्कुल सही कहा आपने..
कतरा गिरा समन्दर में समन्दर हो गया....कौन नहीं जानता....फिर भी अगर इस प्रीत को कोई न अपनाए तो उस से ज्यादा तन्हा कोई हो ही नहीं सकता !!
अच्छी रचना के लिए बधाई !!

संजय भास्कर said...

गद्य और पद्य दोनों का चित्रण बहुत ही उम्दा है ........

संजय भास्कर said...

बहुत ही भावपूर्ण
हुनर पे भारी पड गई ऐब ने अक्सर जान बचाई महफिल का अदब उससे पूछो जिसने गैरो के यहाँ एक शाम बिताई...।

इस लाइन ने तो मन मोह लिया.