Saturday, September 25, 2010

श्राद्द

वैसे तो हम अच्छे मित्र

रहें है बरसो

लेकिन आजकल

बिना सम्बोधन के

सम्बन्ध मे जी रहें है

इसे अजनबीपन और परिचित

के बीच का कुछ समझा जा सकता है

इसके लिए कोई शब्द

अभी शब्दकोश मे नही बना

बरसो-महीनों बातें न करना मोबाइल पर

आजकल सम्बन्धों की

परिपक्वता की पहचान है

लेकिन मिलने पर

गुजर जाना पास से

या देख कर एक दूसरे को ठिठक जाना

एक अजीब भाव के साथ

न खुशी न दुखी

फिर मिलेंगे के सन्देश के साथ

भीड का हिस्सा बन जाना

वाकई बडी बात है

और बडी कलाकारी भी कही जा सकती है

लेकिन दूनियादारी के रंगमंच के

मंझे हुए मेरे कलाकार दोस्त

अक्सर यह भूल जातें है

कि मिलना-बिछडना तो

चलता रहता है

जिन्दगी भर

उम्मीद और सपनों का मर जाना

और इनका श्राद्द इस

अजनबीपन के साथ करना

आसान नही

कुशा हाथ मे लिए

आचमन करते हुए ऐसा लगता है

अभी भी भटक रही है

वो वजह जिसके कारण

हम मित्र बने थें

कभी यूं ही...।

डा.अजीत

4 comments:

वीना said...

बहुत सुंदर कविता...भावप्रधान और सुंदर शब्द संयोजन....

वीना said...

बहुत सुंदर कविता...भावप्रधान और सुंदर शब्द संयोजन....

संजय भास्कर said...

सुंदर शब्द संयोजन...

Apanatva said...

ye aapke anubhav se jude udgaar hai ....fir to tatolana swaisaa kyo....?ayam ko bhee bahut jarooree hai..........
aisaa kyo.......?

bhavnao kee tah tak pahuchana hee hoga......
acchee abhivykti....
aabhar