Sunday, March 11, 2018

अधूरा सच


मैं सत्य से अवगत हुआ
तो  मेरे भ्रम और बढ़ गए
मुझे लगा अभी बहुत कुछ अज्ञात है

उसको जानकार
पता चल सकता है
जीवन का अंतिम सत्य

इस जानने की प्रक्रिया में
सत्य की परिभाषाएं
कई बार बदली मेरे जीवन में
जानकारी लगने लगी सूचनाएं
धारणाएं लगने लगी पूर्वाग्रह

अज्ञानता कोई महिमामंडित करनी की चीज नही है
मगर ज्ञान और सत्य का नही तलाश पाया
कोई सकारात्मक सह सम्बन्ध

सबके थे अपने अपने सत्य
मैंने सदा देखा अपने सत्य को संदेह की दृष्टि से
इसलिए मैं जिस जिस से अवगत हुआ
उसको लेकर मन में बना रहा हमेशा एक संशय

मैं निष्कर्षों का विज्ञापन नही कर रहा हूँ
मगर जीवन के हर निष्कर्ष का था
सत्य से इतर एक मौलिक पाठ
जो न झूठ था और न था सच

मैं अपने अवगत होने को कर रहा हूँ खारिज
शायद यह अकेली बात है
जो खड़ी है सत्य के पक्ष में.

©डॉ. अजित



5 comments:

'एकलव्य' said...

आदरणीय / आदरणीया आपके द्वारा 'सृजित' रचना ''लोकतंत्र'' संवाद मंच पर 'सोमवार' १९ मार्च २०१८ को साप्ताहिक 'सोमवारीय' अंक में लिंक की गई है। आप सादर आमंत्रित हैं। धन्यवाद "एकलव्य" https://loktantrasanvad.blogspot.in/

टीपें : अब "लोकतंत्र" संवाद मंच प्रत्येक 'सोमवार, सप्ताहभर की श्रेष्ठ रचनाओं के साथ आप सभी के समक्ष उपस्थित होगा। रचनाओं के लिंक्स सप्ताहभर मुख्य पृष्ठ पर वाचन हेतु उपलब्ध रहेंगे।

निमंत्रण

विशेष : 'सोमवार' १९ मार्च २०१८ को 'लोकतंत्र' संवाद मंच अपने सोमवारीय साप्ताहिक अंक में आदरणीया 'पुष्पा' मेहरा और आदरणीया 'विभारानी' श्रीवास्तव जी से आपका परिचय करवाने जा रहा है।

अतः 'लोकतंत्र' संवाद मंच आप सभी का स्वागत करता है। धन्यवाद "एकलव्य" https://loktantrasanvad.blogspot.in/

दिगंबर नासवा said...

कई बार सत्य ख़ुद के अंदर ही मिल पाता है ...

वही रोशनी है जो सन भ्रम दूर करती है ...

देशवाली said...

मार्मिक
1.सियासत की मण्डी फिर सज चुकी है
लोग खरीदे जायेंगे, जमीर बैचे जायेंगे हर तरह से
हर हाल मैं मैदान मारने की कोशिश की जायेगी

2.उसे इस बार भी खुदा पर भरोसा है अच्छी बारिश होगी
तो कुछ मालि हालत ठीक हो जायेगी अच्छे दिन ना सही लेकिन ठीक ठाक
दिन तो आ ही जायेंगे

1. मीडिया ने भी क़मर कस ली है हर तरह के दाव लगाये जा रहे है
घोषणाओं की बाढ़ आ चुकी है कहीं रेलियों का दौर है सारे शहर
पोस्टरोँ से पट गये हैं

2. अरी ओ... निमकी क्या हुआ क्यों दौडी चली आ रही है ?
अपनी बेटी को दोड़ता देख इसकी जान हलक मे आ चुकी थी
उसे पता था आजतक खुशियां कभी उसकी तरफ दौड़ कर नहीं आयी
बेटी ने कहा बापू.... छुटकू को बहूत बुखार है अम्मा रिक्शा लेने गयी है

1. नेता जी की रेली निकल चुकी है सारा शहर जैसे उमड़ पड़ा हो
गाड़ियों का काफिला है नेताजी ज़िन्दाबाद के नारे लगाये जा रहे है
शहर की हर सड़क आम लोगों के लिये बन्द कर दी गई है

2. वो अपने खैत खुदा के भरोसे छोड़ कर रिक्शा में बेटे को लेकर चल पडा
लेकिन जब तक नेताजी का क़फिला नहीं गुजर जाता तब तक उसे रस्ता नहीँ
मिलना था...कभी बैटे को देखता है कभी क़फिले को
छुटकू....अरे ओ छुटकू....देख अभी नेताजी का क़फिला निकलने ही वाला है लेकिन... बेटे का दम निकल चुका था

1. क़ाफिला काफी दूर निकल चुका था लेकिन
क़ाफिले के स्पीकर से निकली आवाज अभी भी गून्ज रही थी
की अगर हमारी सरकार आई तो हम गरीबों और किसानों के हित के लिये
काम करेंगे नेताजी ...........ज़िन्दाबाद ज़िन्दाबाद

Unknown said...

सत्य बोध

Unknown said...

सत्य बोध