Tuesday, October 14, 2014

सात बातें

बातें बहुत सी है फिलहाल केवल सात
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ये उन दिनों की बात है
जब
रास्तों की लम्बाई से ज्यादा
चौड़ाई नापी जाती थी
हम दोनों साथ चल नही
फिसल रहे थे।
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ये उन दिनों की बात है
जब
चाँद रिश्तें में मामा नही
अपना यार लगता था।
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ये उन दिनों की बात है
जब
तुम्हारे ख़्वाब गिरवी रख
मिल जाती थी नींद उधार।
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ये उन दिनों की बात है
जब
तुम्हारे स्पर्शो की लिखावट
पढ़ता था
चाय की प्याली पर
हर रोज़ सुबह।
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ये उन दिनों की बात है
जब
तुम नदी सी बह रही थी
मै तालाब सा सूख रहा था
वक्त समन्दर सा ठहरा था
वो पानी की तासीर समझने के
दिन थे।
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ये उन दिनों की बात है
जब
खत भेजने के लिए नही
तुम्हें पढ़ने के लिए
लिखे जाते थे।
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ये उन दिनों की बात है
जब
हम अपनी समझदारी पर
हंस लिया करते थे
बेवकूफों की तरह
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"...अब उन दिनों की
चंद बातें बची है
याददाश्त में आधी अधूरी
मुलाकातें बची है
चंद रफू ख़्वाब है
थोड़ी अफ़सोस की गर्द है
उन दिनों की बातों ख्यालों जज्बातों का
बैरंग पार्सल भेज रहा हूँ तुम्हें
कविता की शक्ल में।"

© डॉ.अजीत

4 comments:

सुशील कुमार जोशी said...

गजब के दिन थे वाह !

Pooja Sharma Rao said...

bahut umda !

Digamber Naswa said...

गहरे एहसास .. लम्हे रुके हुए हों जैसे ...

नवीन जोशी @ http://navinjoshi.in/ said...

आपका ब्लॉग मुझे बहुत अच्छा लगा। मेरा ब्लॉग "नवीन जोशी समग्र"(http://navinjoshi.in/) भी देखें। इसके हिंदी ब्लॉगिंग को समर्पित पेज "हिंदी समग्र" (http://navinjoshi.in/hindi-sam... पर आपका ब्लॉग भी शामिल किया गया है। अन्य हिंदी ब्लॉगर भी अपने ब्लॉग को यहाँ चेक कर सकते हैं, और न होने पर कॉमेंट्स के जरिये अपने ब्लॉग के नाम व URL सहित सूचित कर सकते हैं।