Monday, February 19, 2018

विदा

उसकी नजरों में मेरी इज्जत बढ़ गई थी
यही कारण था कि
हमें लगता था कि
हम एक साथ नही रहने वाले है अब

विदा का समय
कभी दुबके पाँव नही आता
इसकी पदचाप सुनाई देती है
बहुत पहले से साफ-साफ

ये अलग बात है
उस वक्त हमारे कान लगे होती है
दिल के इर्द-गिर्द

जब हम अलग हो गए
मैं दोहराता रहा यह बात
एक दूसरे की नजरों में
इज्जत कम नही हुई हमारी

यही एक कारण था
अक्सर आता रहा याद हम दोनों को
एक दूसरे का साथ
तमाम अनिच्छाओं के बावजूद.

© डॉ. अजित

6 comments:

सुशील कुमार जोशी said...

सुन्दर

HARSHVARDHAN said...

आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन छत्रपति शिवाजी महाराज और ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है। कृपया एक बार आकर हमारा मान ज़रूर बढ़ाएं,,, सादर .... आभार।।

Onkar said...

बहुत सुन्दर रचना

'एकलव्य' said...

आदरणीय / आदरणीया आपके द्वारा 'सृजित' रचना ''लोकतंत्र'' संवाद मंच पर 'सोमवार' २६ फरवरी २०१८ को साप्ताहिक 'सोमवारीय' अंक में लिंक की गई है। आप सादर आमंत्रित हैं। धन्यवाद "एकलव्य" https://loktantrasanvad.blogspot.in/

टीपें : अब "लोकतंत्र" संवाद मंच प्रत्येक 'सोमवार, सप्ताहभर की श्रेष्ठ रचनाओं के साथ आप सभी के समक्ष उपस्थित होगा। रचनाओं के लिंक्स सप्ताहभर मुख्य पृष्ठ पर वाचन हेतु उपलब्ध रहेंगे।

निमंत्रण

विशेष : 'सोमवार' २६ फरवरी २०१८ को 'लोकतंत्र' संवाद मंच अपने सोमवारीय साप्ताहिक अंक में आदरणीय माड़भूषि रंगराज अयंगर जी से आपका परिचय करवाने जा रहा है।

अतः 'लोकतंत्र' संवाद मंच आप सभी का स्वागत करता है। धन्यवाद "एकलव्य"

दिगम्बर नासवा said...

प्रेम
यही है शायद ... यादें अच्छी जान रो
मिलन फिर सम्भव ...

प्रियंका सिंह said...

विदा का समय कभी दुबके पाँव नहीं आता .....इतनी गहनता स्तब्ध हूँ