Tuesday, November 18, 2014

पाठ

वो पढ़ लेती थी
लिखे हुए अक्षरों के बीच पसरे निर्वात को
वो सूंघ लेती थी
सच को झूठ के जंगल के बीच
वो देख लेती थी
माथे की शिकन को मीलों दूर
वो समझ लेती थी
अनकही बात का मूल्य
किसी की फ़िक्र करते हुए जीना
उसकी आदत में शामिल था
नही देख सकती वो
उदास बच्चें
अवसाद में दोस्त
अनमनें परिजन
खुद को भूल दिन भर
ढोंती रहती न जाने
किस-किस के हिस्से का तनाव
खुद की पीड़ाओं पर बात करना
उसके लिए ऊब का विषय था
वो कविता की नही
जीने और समझने का विषय थी
जब यह न कर सका
तो लिख कर कुछ शब्द
निकला आया
उससे बेहद दूर
क्योंकि अपने मतलब के लिए
उसे खर्च नही करना चाहता था
उसका बचा रहना
वक्त और हालात से लड़ते
लोगो के लिए जरूरी था
केवल खुद के बारें में ही न सोचना
उसका पढ़ाया हुआ पाठ था
जो काम आया
इस मुश्किल वक्त में।

© डॉ. अजीत

3 comments:

Dilbag Virk said...

आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 20-11-2014 को चर्चा मंच पर तमाचा है आदमियत के मुँह पर { चर्चा - 1803 } में दिया गया है
आभार

Shiv Raj Sharma said...

सुन्दर

सु-मन (Suman Kapoor) said...

बहुत सुंदर