Sunday, November 9, 2014

गजल

मुझे आदत नही है हंसने की
बेवजह भी हंसा देते हो तुम

थक कर कब्र में सो जाता हूँ मै
सुबह नींद से जगा देते हो तुम

जो गुनाह मैंने ख्वाबों में किए है
हकीकत में उनकी सजा देते हो तुम

रफ़्ता रफ़्ता दूर जा रहे हो हमसें
बातों ही बातों में ये बता देते हो तुम

तन्हाई में मिलो कभी तो बातें हो
भीड़ का अक्सर पता देते हो तुम

फ़िक्र बहुत करते हो मेरी सच है
अफ़सोस ये कि जता देते हो तुम

© डॉ. अजीत

4 comments:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
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आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल सोमवार (10-11-2014) को "नौ नवंबर और वर्षगाँठ" (चर्चा मंच-1793) पर भी होगी।
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चर्चा मंच के सभी पाठकों को
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

सुशील कुमार जोशी said...

बहुत सुंदर हमेशा की तरह लाजवाब ।

सु-मन (Suman Kapoor) said...

बहुत बढ़िया

Virendra Kumar Sharma said...

बढ़िया ग़ज़ल है खबर लेती है प्यार जताने वालों की। प्यार करना और बात है।