Tuesday, August 1, 2017

सफ़र की कविताएँ

सफ़र की कविताएँ
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मेरे पास एक बैग है
उसमे दो जोड़ी कपड़े है
बैग मेरे कंधे पर है
मगर मैं सपनो की मजदूरी करने निकला हूँ
इसलिए मेरे पैर ज़मीन के अन्दर धंसे है
आसमान यह देख मुस्कुराता है
और मुझे याद आता है अपना मनुष्य होना.
**
मेरे पास कुछ पते है
उन पतों  का सही होना थोड़ा संदिग्ध है
मेरे पास कुछ पते है
मेरे पास इस बात से उपजा एक हौसला है
मैं उन पतों पर शायद ही कभी जाऊँगा
मुझे अपना हौसला हर हाल में बचाना है.
**
बस का कंडक्टर पूछता है मुझसे
कहाँ जाना है?
मैं तत्परता से इसका जवाब देने से चूक जाता हूँ
जब वो थोड़ा आगे बढ़ जाता है
फिर मैं एक शहर का नाम बताता हूँ
वो देखता है मुझे लगभग वैसे
जैसे बिन टिकिट कहीं जाना चाहता हूँ मैं
सफ़र में तत्परता से चूकने पर
मनुष्य और गति
कभी नही करती माफ.
**
जहां मैं कल था
वहां अब मैं कब आउंगा
नही बता पता मुझे
जहां मैं आज हूँ
वहां पहले कभी नही आया मैं
जहां मैं कल जाऊँगा
वहां कभी दुबारा नही जाना चाहता मैं
मेरे मन में जितने भी नकार है
वही मेरी यात्राओं का सच और भविष्य है.
**
सफ़र में भूख लगती है
तो याद आता है चना चबैना
प्यास लगती है तो
याद आती है खाली फेंकी गई
कोल्ड ड्रिंक की बोतल
सफर के दौरान
कुछ यादें आती है सिलसिलेवार
फिर नही याद आती
भूख और प्यास.
**

© डॉ. अजित 

Saturday, July 29, 2017

अस्पताल की कविताएँ- 2

अस्पताल की कविताएँ- 2
**
नित्य और अनित्य के मध्य
डॉक्टर का संतुलित मत
कभी भरोसा जगाता था
तो कभी डराता था
उन दिनों मैं हो गया था बेहद कन्फ्यूज्ड
किसे माना जाए भगवान
कभी डॉक्टर लगा था भगवान
तो कभी भगवान लगता था एक डॉक्टर.
**
कभी कभी जूनियर डॉक्टर
सीनियर डॉक्टर से तुम्हारी बीमारी के बारें में
करते थे  सवाल-जवाब
उस वक्त रूम बन जाता क्लास रूम
तुम्हें ‘सब्जेक्ट’ बनता देख लगता था बेहद खराब
तब डॉक्टर से नही करता था कोई सवाल
बस देखता था तुम्हारी तरफ
उस वक़्त तुम ही थी
जिसके पास था मेरे हर सवाल का जवाब.
**
डॉक्टर के लिए
तुम एक बीमार देह थी
यह उनकी पेशेवर प्रशिक्षण का हिस्सा था
फिर भी
मैंने कई बार डॉक्टर को देखा
थोड़ा निजी तौर पर  चिंतित होते हुए
जब तुम ठीक हो गई
डॉक्टर ने अपनी खुशी छिपाई हमसें
तब जान पाया मैं
एक डॉक्टर की परिपक्वता.
***
नर्सिंग स्टेशन का स्टाफ
मेरी अधीरता के कारण
मुझे करता था
थोड़ा नापसंद
महज़ तुम्हारे कारण
वो मुस्कुराते हुए आता था पेश
मैंने डिस्चार्ज के वक्त
जब उनको कहा धन्यवाद
उन्होंने कहा ‘ख्याल रखना’
तुम्हारे प्यारा होने का यह सबसे बड़ा सबूत था
मेर लिए.
**
कुछ दवाओं के नाम
मुझे याद रहा गए है
मैं उन्हें भूलना चाहता हूँ
जब कोई करता है
बीमारी की बात
मेरे याददाश्त हो जाती है ताज़ा
फिर जानबूझकर
बीमारी की बात पर
सुना देता हूँ मैं अपनी एक कविता
दवा को भूलने की
यही एक दवा है मेरे पास.

© डॉ. अजित 

Friday, July 28, 2017

अस्पताल की कविताएँ

अस्पताल की कविताएँ
****

तुम्हारे दाएं हाथ में कैनूला लगा है
मैं उसकी लम्बी सुईं को देखता हूँ
जिस जगह कैनूला लगा है
आसपास नसें दुबक गई है इसके दबाव से
तमाम तकलीफ के बावजूद
तुम्हारा हाथ खूबसूरत लग रहा है
दर्द में ख़ूबसूरती तलाशना मेरी आदत नही वैसे
यह कैनूला तुम्हारे हाथ पर टंका है
किसी पहाड़ी फूल सा
मैंने जब तुम्हारा हाथ अपने हाथ में लिया
इसने किया कुछ इस तरह से ऐतराज़
जैसे इसे मुझसे ज्याद फ़िक्र हो तुम्हारी.
**
वातानुकूलित कक्ष
दीवार पर टंगा एलसीडी
और एक साफ सुथरा कमरा है
फिर भी मैं पलटता रहता हूँ रिपोर्ट्स
उकता कर बंद कर देता हूँ टीवी
तुम्हारी आँख लगी है अभी
सोते हुए देखकर लगता नही तुम बीमार हो
तुम बीमार हो ये सोचकर
नींद नही आती मुझे.
**
मेडिकल की भाषा में यह फ्लूड है
गाँव की भाषा में मैं इसे ग्लूकोज़ कहता हूँ
टप-टप ये बहता है आसमान से जमीन की और
और इन दोनों के बीच तुम लेटी हो
बीच-बीच में यह डरा देता है
जैसे कि बंद हो गया हो इस प्रवाह
मैं चाहता हूँ ये बोतल आखिरी हो
मेरे चाहने से कुछ नही होता
यदि कुछ होता तो तुम यहाँ क्यों होती भला
ग्लूकोज़ को मैं कहता हूँ धन्यवाद
तुम्हारी तरफ से
फ्लूड नही देता कोई जवाब.
**
हर घण्टे बाद
तुम्हारा तापमान नापना है मुझे
ये काम वैसे नर्स का था
मगर मैंने उत्साह से नर्स को मना कर दिया 
हर आधें घण्टे में
तुम्हारे माथे पर हाथ फेरता हूँ मैं
ताकि कम हो सके आने वाले गणना
ये कोई दवा नही है
ये दुआ भी नही है
ये बस मेरा अन्धविश्वासी मन है
जिसे नर्स से ज्यादा खुद पर भरोसा है.
**
बीमारी में
जब आधी गाल से तुम मुस्कुराती हो
अच्छी लगती हो
मेरी हर लम्बी आह पर
ये मुस्कान बरबस निकलती है
इस तरह हम दोनों
विदा करते है
अपने भारी भरकम दुःख को.

© डॉ. अजित


Thursday, July 27, 2017

ख्वाहिश

तुम्हारी आँखों के काजल को देखता हूँ
तो लगता है कि
रात भर तन्हा जले दिए से
हथेली पर स्याही निकाल कर
समन्दर की चारदीवारी कर दी गई हो जैसे 
नीले पानी में ये स्याह रंग इस कदर चमकता है कि
समंदर चाह कर भी कभी
अपनी हदों से बाहर नही निकेल सकेगा
झूठ नही कहूंगा विष कन्याओं की तरह
तुम्हारा माथा थोड़ा तिलिस्मी है
मेरी तर्जनी पर कुछ उच्चाटन मन्त्र छपे है
मैं उन्हें तुम्हारे माथे के हवाले करता हूँ
इसके बाद कोई मुझे सिद्ध न माने
मुझे कोई तकलीफ नही होगी
तुम्हारे दो कानों पर अलग अलग
टापूओं के नक्शे दर्ज़ है
मैं दोनों का मिलान करना चाहता हूँ
दोनों की शक्लें बेहद मिलती है
मगर दोनों एकदम जुदा है
तुम्हारी नाक पर हरसिंगार का
एक फूल अटका हुआ है
वो तुम्हारे गुस्से से दोस्ती करना चाहता है
मगर तुम खुद से खफा हो ये जानकर
वो अपने मंसब से भटक गया है

तुम्हारे शुष्क लबों पर
ना कोई तमन्ना है और ना कोई शिकायत ही है
ये देखकर मेरा दिल थोड़ा बैठ जाता है
तुम्हें अपलक देखतें हुए
मैं अब तक का अपना प्यार पर दिया हुआ
सबसे बेवकूफी भरा बयान याद करता हूँ
ताकि तुम उसे सुन खिलखिलाकर हंस सको
और आदतन मुझसे कहो
‘तुम्हें अभी और बड़ा होना है’
© डॉ. अजित

Tuesday, July 25, 2017

क्रिया

हंसना एक क्रिया है
और रोना एक संज्ञा
मुस्कुराना फिर क्या है?
उसने पूछा
इस सवाल पर मैं
मुस्कुरा कर रह गया
उसने इस क्रिया को
मेरे व्यक्तित्व का विशेषण समझा।
***
नींद एक अवस्था है
और सपनें एक कल्पना
यथार्थ फिर क्या है?
उसने पूछा
मैनें उसके हाथ अपने हाथ मे लिए
और धीमे से कहा भरोसा।
***
मिलना एक सन्योग है
और बिछड़ना शाश्वत
अनुराग फिर क्या है?
उसने पूछा
मिलने और बिछड़ने के मध्यांतर पर टिका
एक पूर्णविराम
मैंने जवाब दिया
उसके पास दूसरा सवाल था
मगर उसने पूछा नही
मुझे यह रिश्तें का आदर लगा।
***
भूलना एक व्यव्यस्था है
और याद करना एक मजबूरी
याद आना फिर क्या है?
उसने पूछा
मैंने कहा
याद आना एक चेतावनी है
पूरी तरह किसी को भूलना
पूरी तरह किसी को याद रखना
तुम्हारे बस का नही।

© डॉ. अजित

Sunday, July 16, 2017

काजल

काजल स्त्री का
वो अंतिम और पहला मित्र है
जो सुख और दुःख में
सदा देता है एक समान साथ

काजल लगाने के लिए
कभी मन का खिला होना जरूरी होता है
तो कभी जी का बुझा होना

काजल मुस्कान का सहपाठी है
जो अक्सर कम नम्बर लाता है
रोजाना की भगदौड़ के बीच

रोज़ जीवन की परीक्षाओं में
काजल के भरोसे पास होती है
असंख्य स्त्रियां

काजल एक किस्म का भरोसा है
जो जानता है स्त्री मन के
तमाम गोपनीय द्वंद,उल्लास और सन्देह

काजल की छाया में सुस्ताती है
लोक की अपेक्षाओं से लड़ती स्त्रियां
ये उनके एकांत का है
सबसे विश्वसनीय साथी

अनिच्छा से लगाया गया काजल
नही पकड़ पाता प्रायः कोई पुरुष
स्त्री इसलिए काजल को रखती है
अपने नजदीक
मगर
बेहद लापरवाही के साथ।

©डॉ. अजित

Tuesday, July 11, 2017

सन्यास

मुझे तुमसे
अपना यह रहस्य नही कहना था कि
मुझे कभी प्यार नही हुआ
मैं पारदर्शिता के वेग में
कह गया बहुत कुछ ऐसा भी
जो न कहा जाता तो बेहतर होता

हद दर्जे की ईमानदारी एक सनक है
और इसी सनक में
मैं कर देता हूँ हर पास आती चीज़ को
खुद से बहुत दूर

मुझे बचाकर रखना था इतना रहस्य
जो हमेशा तुम्हें लगता रहता
थोड़ा अबूझ
जिस दिन से तुम्हारे लिए
प्रिडिक्टेबल हुआ मैं
उस दिन से मेरी बातों में बसने लगी थी
एक बरसाती नमी

मुझे किसी से कभी प्यार नही हुआ
इस कथन में न कोई रोमांच है
और न कोई सम्प्रेषण की गुणवत्ता ही है
बल्कि ये बात बनाती है
प्यार का नाम भी लेने का अनाधिकारी

अब जब तुम पर प्रकट हो गया मेरा रहस्य
तुम देख रही हो मुझे
दुनिया के सबसे निर्धन
मगर चालाक आदमी की तरह
मेरी व्यंजनाएँ सब लगने लगी है
झूठी और कृत्रिम

मेरी तमाम कविताएँ
भोजन की तरह सूंघकर
तुमनें घोषित कर दी है बासी और खराब

इन सबके मध्य
मैं खुद को बचा रहा हूँ
मुझे कभी प्यार नही हुआ
इसके अनुलोम-विलोम से

यदि मैं बच सका तो
करूँगा प्रवचन एकदिन
मनुष्य के जीवन मे रहस्य की महत्ता पर
मुझे कभी प्यार नही हुआ
इस कथन को कीर्तन में बदलनें के लिए
लेना पड़ेगा मुझे
कई-कई जन्मों तक सन्यास

ये अलग बात है
तुम्हारी नजर में होगा वह भी
एक कोरा ढोंग
जन्म-जन्मान्तर तक।

©डॉ. अजित

Sunday, July 9, 2017

लाभ

मेरी देह की त्वचा
इतनी संवेदनहीन हो गई है कि
एक नन्ही चींटी
इसे धरती समझ दौड़ रही है
बेपरवाह

मैं उसकी दौड़ में कोई बाधा नही चाहता
इसलिए लम्बवत पड़ा हूँ बहुत देर से
मैं नही चाहता कि मेरे कोई हरकत
उसे उसकी गलती का अहसास कराए

धरती से कुछ फीट ऊपर
चींटी का उत्साह देखते ही बनता है
वो मेरे पैर के अंगूठे पर उगे बालों को
जंगल समझ खेल रही भूलभुलैय्या

त्वचा सम्वेदनहीन होकर
पेश आती है धरती की तरह
और धरती सम्वेदनहीन होकर बन जाती
एक उखड़ी हुई त्वचा
एक आंख से चींटी
और एक आंख से धरती देखने पर
इस निष्कर्ष पर पहुँचा हूँ मैं

जो चींटी मेरी देह को
धरती समझ घूम रही है
वो दरअसल व्यस्क नही

मैं इसलिए आश्वस्त हूँ
मुझे डंक का भय नही
इसलिए उदार हूँ

मेरी आश्वस्ति को
उदारता या प्रेम नही समझा जाए
त्वचा का सम्वेदनहीन होना
मुझे देर रहा है
कौतूहल देखने का आत्मविश्वास

मैं वयस्क हूँ
और चींटी नही है
दोनों ले रहे है अपने अपने लाभ

सम्वेदना का हीन हो जाना
हम दोनों को सीखा रहा है
अपने अपने हिस्से का लाभ लेना।

©डॉ. अजित

Monday, July 3, 2017

सलाह

वो कहती दुनिया की बातों को
दिल पर न लिया करो
दुनिया का काम है कहना
सबकी सुनोगे तो
जीना मुश्किल हो जाएगा
वो मेरा जीना आसान करना चाहती थी
मगर नही तलाश पाई एक मुकम्मल तरीका
फिर यूं हुआ
एकदिन वो खो गई भीड़ में

मैं उसकी बातें एक जगह संकलित कर रहा हूँ इनदिनों
उन बातों में सलाह है नसीहत है
और जगह-जगह दुबका हुआ प्यार है
उसकी चिंताओं की मैंने एक जिल्द बनाई है
जिसके अंदर उसकी सलाह रखी है

हालांकि उसकी एक सलाह नही मानी मैंने
मगर
उसकी सलाहों का एक गहरा मूल्य है मेरे जीवन में
जब किसी को सलाह देता हूँ मैं
एक वरक उसकी किताब का पढ़ लेता हूँ
और लूट लेता हूँ  श्रेय
एक बढ़िया सलाहकार होने का

कभी-कभी सोचता हूँ
अगर उसकी सलाह मान लेता मैं
तो क्या आज बढ़िया सलाहकार होता मैं?
शायद नही

अब, जब वो नही है
और मैं कर रहा हूँ सालाह का कारोबार
वो हंसती होगी मेरी चालाकी पर
जो उसके रहते नही सीख पाया मैं.


© डॉ.अजित 

आत्महत्या

आत्महत्या वह भी कर सकता है
जो बेहद जीवट हो
जीवन वह भी जीए जा सकता है
जो बेहद निराश हो

आत्महत्या करने की एक वजह होती है
और जीवन जीने की अनेक

जीवट आदमी की आत्महत्या
जीवन पर भरोसा कम करती है
निराश व्यक्ति की आत्महत्या
जीवन को क्रूर कहती है
और व्यक्ति को कायर

आत्महत्या एक अंतिम सुविधा है
जिसे चुनता है मनुष्य
असुविधाओं की ऊब के बीच

हर आत्महत्या की खबर
एक आत्मकथा है
अतीत जिसका पूर्व पाठ है।

©डॉ. अजित

Sunday, June 25, 2017

मोक्ष

मैं भूल गया उन लोगों को
जिनसे मैनें दुःख में पूछा था हालचाल
मेरे पास उनकी अस्थाई समस्या के
स्थाई समाधान नही थे
फिर भी मैनें दार्शनिक होकर कहा
बुरा वक्त है बीत जाएगा

जबकि जानता था मैं
वक्त न बुरा होता है और न अच्छा

मुझे याद है वे लोग
जो अपनी खुशी में करना चाह रहे थे
मुझे शामिल
मैनें झूठे उत्साह के साथ उन्हें दी
बधाई और शुभकामना एक साथ
इन दो शब्दों से उन्होंने मुझे शामिल समझा
और इन्ही दो शब्दों से मैंने खुद को अनुपस्थित

दोनों किस्म के लोग
पीछा करते है मेरा रोज़ सपनों में
वे मुझसे कुछ कहते नही
बस कभी टांग देते है मुझे किसी मचान पर
तो कभी फेंक देते पहाड़ की ऊंचाई से
दोनों की स्थितियों में
मुझे डर नही लगता है
और न ही मैं होता हूँ चोटिल

जिन्हें मैं भूल गया
या जो मुझे याद रह गए
वे न मेरे मित्र है और न शत्रु
फिर भी
वो मुझसे पूछते रहते है
एक ही बात बारम्बार
'तुम्हारा नम्बर कब आएगा'

जब तक मैं समझ पाता हूँ उनका सवाल
और जवाब देना चाहता हूँ
वे एक साथ हंसने और रोने लगते है
उस कोलाहल में दब जाता है
मेरा जवाब

फिर मैं याद करता हूँ उन लोगों को
जो न मुझे याद है
और न ही जिन्हें भूला हूँ मैं

वे हाथ पकड़कर ले जाते है मेरा
और छोड़ आते है उस एकांत में
जहां रोटी और पानी की नही
प्रेम की बातें जिंदा रखती है मुझे

मैं मुद्दत से रोटी और पानी को भूल गया हूँ
प्रेम भी मुझे कोई खास याद नही है
मुझे केवल प्रेम की कुछ बातें याद हैं

जिन्हें सुनकर और पढ़कर
दुनिया कर देती है मुझे माफ़
फिलहाल मेरी मोक्ष में
इसलिए भी दिलचस्पी नही है
क्योंकि
माफीयाफ्ता शख्स के लिए
जीना जरूरी होता है।

©डॉ. अजित

Saturday, June 24, 2017

इंतजार

बारिश का इंतजार
वो करते है
जिनकी मुट्ठी में बीज है
या फिर वो
जिनके पास धरती की प्यास का
पोस्टकार्ड है

बारिश का इंतजार करना
ठीक वैसा है
जैसे घर मे खोई अपनी
चप्पल ढूंढना।

©डॉ. अजित

कायदे से

कायदे से
इतनी मुस्कान तो होनी ही चाहिए
मनुष्य के पास
कि बुरे वक्त में
जिसे दिया जा सके
किसी जरूरतमंद को उधार

मगर मुस्कान होती है
खुद के पास महज इतनी
जिसे खर्च किया जा सकता है
फोटो खिंचवाते वक्त
जब फोटो क्लिक करने वाला कहे
स्माइल प्लीज़
और आप फैला दें
होंठो का अधिकतम विस्तार

कायदे से
इतनी हंसी तो होनी ही चाहिए
मनुष्य के पास
वो हंस सके बुक्का फाड़कर
दोस्तों के बीच

मगर हंसी होती है मूड की गुलाम
आप तब हंसते है
जब हंसना हो एक शिष्टचार
रोने की तर्ज पर जब हंसी आती है
तब वो बन जाती है एक ध्यान
रोने की तर्ज़ इसलिए
सबके लिए सीखनी जरूरी है

कायदे से तो यह भी होना चाहिए
जब कोई कहे अपने दुःख
हम जवाब में अपने दुःख भी कहे
दुःख के लिए यह हौसले से बड़ी
सांत्वना है

मगर दुःख सुनकर मनुष्य
करना चाहता है सलाह का कारोबार
जिनके पास अपने दुःख का निदान नही
उनके पास बी पॉजिटिव रहने के कोट्स
मिलेंगे हजार

कायदे से बहुत कुछ
नही होना दुनिया में
मगर वो सब कुछ मौजूद है
अपनी तीव्रता के साथ

और कायदे से जो होना चाहिए
वो घटित होता है हमेशा
अनुचित और अवांछित ढंग से

इसलिए
तमाम दुनियावी कायदे पढ़ने के बाद भी
मनुष्य है एकदम अनपढ़

सभ्यता मनुष्य के अनपढ़ होने का विज्ञापन है
जिसे प्रचारित किया गया है
ज्ञान के  विकास के तौर पर

कायदे से
मनुष्य को सबसे पहले करनी चाहिए
खुद से एक गहरी मुलाकात
ताकि जान सके
खुद के धूर्त होने की अधिकतम सीमा

मगर वो फिलहाल व्यस्त है
मनुष्य को मनुष्य के तौर पर
खारिज़ करने में
समझ का यह क्रूर पक्ष है
जो दिखाई नही देता है।

©डॉ. अजित

Friday, June 23, 2017

अनुमान

सोकर उठा तो लगा कि
धरती के सबसे निर्वासित कोने पर
अकेला बैठा हूँ

नींद की थकान के बाद
देख रहा रहा हूँ
जागे हुए चेहरों की उदासी

धरती घूम रही है अपनी गति से
इसका अनुमान लगाने के लिए मैं थम गया हूँ
मेरी गति अब पुराण की गति के बराबर है

जिसे दुर्गति, निर्गति, सद्गति
कुछ भी समझा जा सकता है
अपनी अपनी समझ के हिसाब से

जिस जगह मैं हूँ
वहां से एक रास्ता दुनिया की तरफ जाता है
एक रास्ता दुनिया की तरफ से आता है
मगर मैं जिस पगडंडी पर खड़ा हूँ
वहां से दोनों रास्ते अलग नही दिखते है
इसलिए मैं देखने की ऊब से
आसमान की तरफ देखने लगता हूँ

आसमान मुझसे पूछता है
धरती के इस कोने का तापमान
मगर मेरे पास मात्र अनुमान है
इसलिए छूने से डरता हूँ धरती के कान

जब से सोकर उठा हूँ
मैं नींद को देख रहा हूँ बड़ी हिकारत से
दोबारा सोने से पहले मेरे कुछ डर है

मसलन अगर

इस बार आसमान ने पूछ लिया
मेरा ही द्रव्यमान
तो क्या कहूँगा उसे

फिलहाल जिस कोने पर बैठा हूँ मैं
वहां से कुछ भी नापा जाना सम्भव नही

मैनें आसमान की तरफ कर ली है पीठ
और धरती की आंखों में देख रहा हूँ
अपनी नींद में डूबी आंखें
शायद देखते-देखते फिर आ जाए नींद

और मैं सोते हुए बच सकूं सवालों से
लेकर कुछ अधूरे सपनों की ओट
नींद और जागने के मध्य
मैं तलाश रहा हूँ वो कोना
जहां मैं खुश हूँ ये बताना न पड़े किसी को
और मैं उदास हूँ छिपाना न पड़े किसी से।

©डॉ. अजित

Friday, June 16, 2017

सलाह

शब्दों को बड़ी सावधानी से चुनना सखी
शब्द रास्ता रोकेंगे
शब्द मन को भरमाएंगे

रहना हमेशा इतना सावधान
जितनी रहती हो मंदिर में ईश्वर के समक्ष
रहना इतनी लापरवाह
जितनी रहती हो विंडो सीट पर बैठकर

शब्दों के फेर में उलझ मत जाना सखी
हो सके समझना शब्दों की माया
सन्देह मत करना मगर सोचना यह भी
शब्दों की होती है अपनी एक काया

कहना या सुनना
मगर बहुत ध्यान से चुनना
एक-एक शब्द
इनकार हो या मनुहार
सबसे भरोसेमंद क्यों न हो प्यार

शब्दों पर देना गहरा ध्यान
मत बन जाना थोड़ी सी अनजान
मत ढोना शब्दों का बोझ सखी
कह देना अपनी खोज सखी

शब्दों को ब्रह्म बताने वाले
नही बता कर गए ब्रह्म का पता
शब्दों के जरिए ब्रह्म को
मत खोजने लग जाना सखी

हो सके तो खुद को भरम से बचना सखी।

©डॉ.अजित

Thursday, June 8, 2017

हार

मैं जीत नही पाया
इसका यह अर्थ कतई नही है
मैं हार गया हूँ

दरअसल
मैं जीत नही पाया
ये एक मुकम्मल कथन है

हार की बात
जीतेने वालों नही करनी चाहिए
और आदतन
हारने वाला  तो कभी नही करता

हार के औचित्य को
जीत की अनिच्छा से
नही ढ़का जा सकता यह सच है

हार-जीत के मध्य एक कोना है
जहां सच,सच नही लगता
और झूठ, झूठ नही लगता

वहां से सम्बोधित किया जा सकता है
सही गलत के लंबित पड़े मुकदमों के अभियुक्तों को

फिलहाल,वही कर रहा हूँ मैं।

©डॉ. अजित

सुख है

मुद्दत से मैं इस कदर खाली हूँ
जिससे एक बार बातें 
करना करता हूँ शुरू
फिर भूल जाता हूँ समय का बोध
उसकी रूचि के केंद्र
मैं उघड़ता जाता हूँ 
किसी पुराने टाट की तरह

मेरे पास निजी दुःखों के 
इतने रोचक आख्यान है कि
श्रोता उनमें तलाश लेता है
अपने दुःखों के लिए सांत्वना
यह मेरे दुःखों की सबसे बड़ी
भावनात्मक उत्पादकता है 

दुःखों के आख्यान रोचक है 
मगर असल मे दुःख है बहुत बोरिंग
वो मुद्दत से मेरी शक्ल देखकर 
ऊब के शिकार है
उनकी ऊब आप पूछ सकते है
मेरे छिट-पुट सुखों से

मैं इस कदर खाली हूँ कि 
बातचीत में भूल जाता हूँ 
छोटी छोटी बात
मगर मुझे ठीक से याद 
अपने जीवन के सारे अपमान

मैं जब सुना रहा होता हूँ अपने दुःख
मुझे लगता है दुःख निरपेक्ष होकर
सुने जाते है
दुःख को सुनने वाला जानता है
दुःख का आदर करना
कई बार सही साबित होता हूँ
कई बार होता हूँ गलत साबित

मुद्दत से यह मेरी दबी कामना रही है 
कि मैं अपने दुःखों को कुछ तरह से 
करूँ प्रस्तुत 
कि मेरा पीड़ित होना हो जाए
सम्प्रेषित 

मैंने खालीपन के दौरान ही जाना
यह ब्रह्म सत्य
दुःखों को सुनने के बाद
आप सिद्ध होते है बेहद मामूली
जबकि
सुखों को सुनकर मिलती है प्रेरणा
इसलिए दुःख नही आते 
आपके किसी काम 
पर्याप्त संख्या के बाद भी 

लड़ता गिरता सम्भलता व्यक्ति
बहुत देर तक नही बांध पाता 
अपनत्व की तिरपाल 
उखड़ जाते है उसके पैर 
एक छोटे से अनौपचारिक मजाक से

जिनसे मैनें कहे अपने अनकहे दुःख
वे कान चिपक गए दिमाग से
वे आंखें प्रार्थनारत हो गई नींद के लिए
वे मनुष्य जुट गए तैयारी में
उनके हृदय पर भारी पड़ गई 
अपने दुःखों को लांघने की जल्दबाज़ी

मुद्दत तक दुःखों पर बात करने के बाद
अब मुझे कोई दुःख नही है
दुःख वास्तव में होने चाहिए 
बेहद निजी
दुःख से उपजी आत्मीयता
इतनी चलताऊ चीज़ है
इधर आप सुना रहे हो 
अपने जीवन का
सबसे त्रासद किस्सा
उधर कोई कहे
क्या बात है !

मैनें दुःखों की बातें बंद कर दी अब
हालांकि खाली उतना ही हूँ अभी भी
फोन पर जब कोई पूछता है हालचाल
तब अनिल यादव की तरह कहता हूँ
सुख है !

©डॉ. अजित 




Thursday, June 1, 2017

शिकायत

एकदिन थककर स्त्री
वापिस ले लेती है
अपने पूरे सवाल
आधे सन्देह
और एक चौथाई सम्भावना

वो ओढ़ लेती है
एक जीवट मुस्कान

पुरुषार्थ की अधिकांश विजय
ऐसी मुस्कानों पर ही खड़ी होती है तनकर

स्त्री के पास होता है
बेहद एकांतिक अनुभव
जिसे नही बांटती वो किसी अन्य स्त्री से भी

यही बचाता है उसके अंदर
एकालाप की ऐसी हिम्मत
जिसके भरोसे वो
पुरुषों की दुनिया में बनी रहती है
एक अबूझ पहेली

प्रेम स्त्री की थकन नही नाप पाता
घृणा स्त्री की अनिच्छा नही देख पाती
दोनों की मदद से
जब पुरुष करता है
किसी की किस्म का कोई दावा

तब स्त्री रोती है अकेले में

ये बात केवल जानता है ईश्वर
मगर वो नही बताता
किसी पुरूष का कान पकड़कर
एकांत का यह अन्यथा जीया दुख

और भला बता भी कैसे सकता है
पुरुष ने उसका हाथ चिपका रखा है
हमेशा से खुद के सिर पर
एक स्थाई आशीर्वाद की शक्ल में

स्त्री इसलिए ईश्वर से नही करती
कोई शिकायत
वो जानती है ठीक ठीक यह बात
जो सबका है
कम से कम उसका तो
बिल्कुल नही हो सकता है।

©डॉ. अजित

Wednesday, May 24, 2017

पिता का जूता

मेरे पिता जी
बाटा का जलसा जूता पहनते थे
बाटा पर उनका यकीन
मुझ पर यकीन से ज्यादा था

गांधी को वो मात्र
खादी भंडार से जानते थे
शहर में जाते तो जरूर जाते गांधी आश्रम
उन्हें कपड़े की उतनी समझ थी
जितने मुझे आदमी की नही है

पिता जी को मोहम्मद रफी पसन्द थे
मुकेश के लिए वो कहते
गाता अच्छा है मगर नाक से गाता है
मैनें उन्हें जब मिलवाया किशोर कुमार से
उन्होंने कहा
ये नौजवानों का गायक है

ज्वार भाटा और वक्त
उनकी पसंदीदा फ़िल्म थी
नए लोगो में उन्हें अजय देवगन थे पसन्द
हमनें कई फिल्में साथ देखी
मगर हमारी पसन्द हमेशा रही जुदा

पिता के मरने पर
मैनें उनका जूता नही दिया किसी को
कभी कभी उसमें पैर डालकर
देखता हूँ अकेले में
आज भी वो ढीला आता है मुझे

जब कभी दुनिया के धक्के और धोखे खाकर
हो जाता हूँ थोड़ा हैरान थोड़ा परेशान
जी करता है पिता जी का
वही बाटा जलसा जूता उठाकर
दो चार जड़ लूं
खुद ही खुद के सिर पर

पिछली दफा जब ऐसा करना चाहा मैनें
तो ऐसा करते मुझे देख लिया मेरी माँ ने
पिता के मरने के बाद
पहले बार वो रोई एक अलग स्वर में

मेरे पास पिता का जूता है
मेरे पास मेरा सिर है
और मेरा पैर है
मगर तीनों में कोई मैत्री नही है
तीनों अकेले और असंगत है

जीवन की यह सबसे बड़ी शत्रुता है मेरे साथ
जिसे मैं अकेला खत्म नही कर सकता।

©डॉ. अजित

Friday, May 19, 2017

बबली

बबली मेरी बड़ी बहन है
उम्र में मुझसे दो साल बड़ी है
उसके ब्याह में अट्ठारह साल का था मैं
पिता की तरह पेश आया मैं
उसके ब्याह में
हलवाई, किरयाने का सामान, फ़र्नीचर
कपड़े गहने सबके लिए दिया पैसा

उसके ब्याह में
पिता मुझे प्रशिक्षित कर रहे थे या दंडित
नही समझ पाया आज तक

पिता के जाने के बाद
बबली मुझसे नाराज़ है
उसे शिकायत है
न मैं पिता रहा और न भाई
हम भाई बहन बचपन मे कभी नही लड़े
लड़ते आज भी नही है
हमारी लड़ाई अब खत्म हो गई है
और दिखने वाला प्यार भी

बबली की शिकायतें
सीधी नही पहुंचती है मुझ तक
वो सामने हमेशा दिखती है सामान्य
मगर उसकी कुछ गहरी शिकायतें है
हम तीन भाईयों में
उसे लगता  हूँ
मैं सबसे कम जिम्मेदार
जबकि वो साक्षी है अपने ब्याह में
मेरी बगल में दबे बैग की
टूटी तनियों के चप्पलों की

बबली जिस शहर में रहती है
वो पुराना जिला है मेरा
मैं वहां कम जाता हूँ अब
पहले पिताजी के साथ जाता था कचहरी
बबली को लगता है
वो वहां रहती है
इसलिए अब वहां नही जाता मैं

मैं भाग रहा हूँ
हर रिश्तें नाते से रात-दिन
मेरे पास नही है कोई ऐसी उपलब्धि
जिसे सुना मेरी सगी बड़ी बहन
कुछ दिन गर्व से रह सके
अपनी ननद और सास के बीच

वो एक आश्वस्ति चाहती है
अपने बच्चों को लेकर
कि मैं कम से कम मतलबी मामा न बनूँ
पढ़ा-लिखा पीएचडी हूँ
गाइड करूँ उन्हें उनके करियर के लिए
मदद कर सकूं दो पैसों की
कम से कम इतना लायक बनूं जरूर

मैं बबली से बात करना चाहता हूँ
अपनी सगी बड़ी बहन के सामने
मेरे इतने संकोच घिर आए है
मैं कुछ भी कहूँगा
तो उसे लगेगा सफेद झूठ
वो अब बिल्कुल नही पहचानती मुझे

वो भूल गई कि पिछले सत्रह सालों में
वक्त ने इस कदर तोड़ा और
बदलने पर किया मजबूर  मुझे
अब मैं बबली का तो क्या
किसी का भाई ,पति, पिता,बेटा कुछ न रहा

बबली के पास एक वाजिब शिकायत है
खुद में खो गया हूँ मैं
यह सच है  इस कदर खो गया हूँ मैं
कि आप शायद ही
किसी पारिवारिक उत्सव में हो सकूं
शामिल अपने बड़प्पन के साथ

बबली मुझसे दो साल बड़ी है
मैं बबली से कई बड़ा हूँ
हम दोनों एक दूसरे से छोटे है
यही हम भाई बहन की
वास्तविक आयु है।

©डॉ. अजित

Thursday, May 18, 2017

चुप्पा

आजकल हमारे बीच चुप्पा चल रहा है
चुप्पा और अबोला में एक बुनियादी फर्क है
अबोला किसी नाराजगी में होता है
चुप्पा अकारण हो जाता है
लगता है जैसे बातचीत के
सारे विषय समाप्त हो गए है

हम एक दूसरे से ऊबे हुए प्रेमी है
जैसे पतझड़ में धरती ऊब जाती है सूखे पत्तो से
और दिन में हरियाली से ऊब जाता है आसमान

एक मंजिल पर पहुँच कर
हम दिख रहें हैं चुके हुए
प्रेमी युगल की तरह
जैसे आख़िरी बस छूट गई हो
किसी दूरस्थ देहाती गाँव के लिए
और हम अकेले खड़े रह गए हो
किसी सुनसान कस्बें में  

एक दुसरे की शक्ल देखते देखते
हम भूल गये है अपना-अपना सौन्दर्यबोध
इसलिए नही कर पाते तारीफ़
अब किस अच्छी चीज की

स्मृतियों के वातायन में
सूख रहे है सांझें स्वप्न
उन्हें तह करके रखना होगा
अब हिज्र के  मौसम के लिए  

फिलहाल
छूट रहे है हाथ
जैसे पतवार से छूट जाते है किनारे
और नदी समझती है कोई उसे पार गया


ये विचित्र संधिकाल है
यहाँ किसी के पास कोई आरोप नही है
कोई महानताबोध से ग्रसित भी नही है
विलगता का कोई नियोजन भी नही है

इस चुप्पा में
उड़ रही है  रिश्तों की मीठास
अपनी लय और गति के साथ
बेहद धीमी गति से.

बिना किसी औपचारिक भूमिका के
यह कहना पड़ रहा है मुझे  
अब  मिट रही है हमारी संयुक्त पहचान

समय को इस पर खेद है
मगर हमें समय पर कोई खेद नही है
ये विचित्र मगर खराब बात है
जिसे  जान पाया हूँ मै
 इस  अनजानी चुप के बीच.


© डॉ. अजित