Saturday, July 30, 2016

चाहतें

आओ ! इन नरगिसी आँखों के सदके लूँ
पुखराज़ को तुम्हारी वेणी में गूंथ दूं
ओस के कतरो से पलकों पर कश्ती उतार दूं
शुष्क लबों पर झील का धीरज सजा दूं

मुस्कान और हंसी के बीच की हरकतों पर
कुछ छोटी छोटी मुकरिया लिख दूं
धड़कनों के बीच एक खूबसूरत ग़ज़ल रफू कर दूं
साँसों के पैबंद लगा कर रूह का बोसा ले लूँ

आओ ! तुम्हारी अंगड़ाईयो की स्याही से समंदर को खत लिखूँ
गुस्ताखियों के कागज़ का जहाज़ बनाकर उड़ा दूं
मुहब्ब्तों का लगान मद्धम चराग की रोशनी में पढूं
शिकवों पर नादानी की मुहर लगा बेपते रवाना कर दूं

आओ ! किसी दिन
तुम्हारे कान में फूंक दूं कुछ तिलिस्मी मंत्र
सीखा दूं थोड़ी बदमुआशी थोड़ी अय्यारी
जिस्म के वजीफे मांग लूँ उधार
ताकि उतर सकें दिल की पर ज़मी एक लिज़लिजी काई

आओ ! मगर इस तरह आना
जैसे समंदर के किनारे आते है सीप
जैसे नदियां भूल जाती है अपने उद्गम गीत
जैसे हवा अचानक बन जाती है दक्खिनी
जैसे लोहा टूटकर भी चाहता है धौंकनी

आओ ! किसी दिन इस तरह भी
मेरी तरह नही केवल अपनी तरह
मुन्तजिर हूँ मुफकिर हूँ बेफिक्र हूँ
तुम जरूर आओगी इस तरह भी
एक दिन।

© डॉ.अजित

Friday, July 8, 2016

असफलता

मुद्दत बाद मिलनें पर उसने कहा
बड़े अश्लील हो गए हो तुम
और थोड़े घटिया भी
उसने जवाब दिया
कोई नई बात कहो
इतने दिन बाद मिली हो
और वही कह रही हो
जो दुनिया कहती है

अच्छा ! दुनिया ऐसा कहती है तुम्हारे बारे में?
उसने चौंकते हुए कहा

हां !

फिर तुम ये नही हो सकते
तुम तो दुनिया को गलत साबित करने के लिए पैदा हुए थे
मैं गलत थी फिर इस हिसाब से

अच्छा क्या हो गए हो फिर तुम?

मेरे ख्याल से थोड़ा तल्खज़बाँ
थोड़ा बदतमीज़
उसने आत्म समर्पण की मुद्रा में जवाब दिया

हम्म !
आदत अच्छी नही मगर इतनी भी बुरी नही कि
तुम्हारी शक्ल देखना पसन्द न करें कोई

क्या फर्क पड़ता है इन सब बातों से! वो अब दार्शनिक मुद्रा में था

फर्क बस इतना पड़ता
अब हमें हंसी नही आती इन बातों पर
ये क्या कोई कम बड़ा फर्क है तुम्हारे हिसाब से,उसने चिढ़ते हुए कहा

हंसी हमेशा किसी बात पर ही आती है इसलिए हंसी मजबूर चीज़ है थोड़ी
उदास आदमी बेसबब भी हो सकता है

ओह हो ! तो ये बात है
शायर हो गए हो तुम उसने छेड़ते हुए कहा

शायर हुआ नही जाता है आदमी हो जाता है

मतलब इश्क विश्क टाइप उसने हंसते हुए पूछा

छोड़ो ये बातें अच्छा ये बताओं
दिलचस्पी का मरना किस तरह देखती हो तुम
उसने कहा ठीक वैसे जैसे तुम्हें देखकर खुद को देखती हूँ

ये ठीक बात कही तुमनें तमाम बातों के बीच

अब एक मेरे भी एक सवाल का जवाब दो
प्यार बदलता क्यूँ है
प्यार बदलता नही है स्थिर होकर सूख जाता है

ऊँहूँ ! बात जमी नही कुछ
इतने कमजोर तर्क कब से करने लगे?

चलो ! अपनी वही प्रेम कविता सुनाओं
जिसे पढ़कर प्यार दुनिया की सबसे पवित्र चीज़ लगता था

उसने कहा,याद नही अब तो

तुम में सच अब बेहद घटिया हो गए हो
अश्लील भी
इसलिए नही कि दुनिया कहती है
इसलिए अब तुम अपनी प्रिय कविता भूल गए हो

हम्म !

फिर कोई सवाल जवाब नही हुआ दोनों मध्य
दोनों एक दूसरे को देखते रहें थोड़ी देर
और विदा हो गए
अपनी अपनी असफलता पलकों पर लेकर।

©डॉ.अजित

Tuesday, July 5, 2016

इयत्ता

अपनी इयत्ता में सिमटा
हर शख्स
थोडा सा अजीब हो ही जाता है

अनुमानों से छलनी उसका सीना
प्रेम भी करता है बेहद झीना

बात केवल एक अवस्था की नही है
एकदिन आप भूल जातें है
अपनी चड्ढी बनियान का नम्बर
फिर अनफिट चीज़े पहनना
एक किस्म की मजबूरी भी होती है
मगर नही रहती किसी से कोई शिकायत

शिकायत का न होना एक किस्म की संधि है
जिसका उल्लेख किसी युद्ध के इतिहास में नही मिलेगा

दुनिया की कृत्रिमता छिप भी जाए
खुद पर सवाल खड़े करने वाले नही छिप पाते
किसी सुदूरवर्ती द्वीप पर भी
वो दराज़ में मुंह देकर खंगालते है पुराने कागज़
ताकि मिल सके उनकी रिहाई का खत

अजीब लोगो की बीच रहते है कितने अजीब लोग

इसी रिहाइश पर
कुछ लोग नक्शा लेकर खड़े होते है
वो चाहतें दुनिया से करना
इन अजीब लोगो को बेदखल
ताकि दुनिया में बची रहे एकरूपता

अपनी इयत्ता में सिमटे हुए शख्स
इतने मामूली होते है कि
आप उन्हें हंसते या रोते हुए नही पहचान सकते

उनकी हूक में विलुप्त हुई जातियों के ऋण दबे होते है
उनकी हंसी में क्लोन के सन्देह शामिल होते है
उनकी मुस्कान गैर बौद्धिक होती है
नही कह सकते आप उसे मासूम

सिमटता हुआ आदमी
दिखता है बेहद अरुचिपूर्ण
सबसे आसान होता है उसे खारिज़ करना
दरअसल,उसे खारिज़ करना ठीक वैसा है
जैसे धरती पर बैठकर कहना
यही है धरती का एकमात्र मध्यबिंदू
फिर आप व्यवस्थित करते रहे
कर्क रेखा अपने हिसाब से

अपनी इयत्ता में सिमटा हर शख्स खतरा है
सभ्य समाज के लिए
क्योंकि वो नही जानता विशुद्ध साइंटिफिक केलकुलेशन
वो होता लगभग अनपढ़
रिश्तों को उपयोग करने के कौशल में
वो जोड़ लेता दशमलव के बाद का भी शून्य
अपनत्व के भरम में

उसे खदेड़ना चाहिए देखते ही
डराना चाहिए पाषाणकालीन आवाज़ों से
अलबत्ता तो वो डरेगा नही अगर एक बार डर गया
फिर वो जोर जोर से गाएगा गर्व से भरे गीत

अपनी इयत्ता में सिमटे शख्स का डर
होता है बेहद विचित्र
वो डर जाता है एक आत्मीय हंसी से
एक निजी सवाल से
और जब वो डरता है
तब दिखता है ठीक उनके जैसा
जिनकी खुद से बिलकुल मुलाकातें नही

अपनी इयत्ता में सिमटे शख्स को
बस हम इसी तरह देखना चाहतें है
फिर हो जातें है हमे थोड़े बेफिक्र
सुला देते है अपने बच्चों को दिन में
और रात में लिखतें है न होने क्रांतियों के पाठ

जिन पढ़कर एक जवान पीढ़ी हो जाती है तुरन्त बूढ़ी।

© डॉ.अजित

एकदिन

बहुत दिन बाद
मिलनें पर पूछा उससें
क्या तुम्हें भी आवाज़ मोटी लगती है मेरी
याददाश्त पर जोर देकर सोचते हुए
उसनें कहा हां थोड़ी भारी है
मैंने कहा एक ही बात है
इस पर बिगड़ते हुए वो बोली
एक ही बात कैसे हुई भला
आवाज़ हमेशा भारी या हलकी होती है
मोटी या बारीक नही
मोटा आदमी हो सकता है
बारीक नज़र हो सकती है
तुम्हारी आवाज़ भारी है
मैंने कहा फिर तो तुम्हारे कान भी थकते होंगे
उसनें कहा नही
मेरा दिल थकता है कभी कभी
मैंने कहा कब थकता है दिल
लम्बी सांस लेकर उसने कहा
जब तुम्हारी आवाज़ भारी से मोटी हो जाती है
तब तुम्हारी नजर बेहद बारीक होती है
ये सुनकर मैं हंस पड़ा
उसने कहा तुम्हारी हंसी भारहीन है
मैंने कहा कब तौली तुमनें
उसने कहा
जब तुम उदास थे।

©डॉ.अजित

Thursday, June 30, 2016

गजल

जब खुद के अंदर बाहर रहना
तब क्यों किसी को बुरा कहना

सारे ऐब ही जब हमारे अंदर है
मत आदतन हमे अब खुदा कहना

समन्दर से गुफ़्तगु तुम करते हो
नदी से पूछते क्या होता है बहना

दर ब दर किस्मत में लिखा था
हम क्या जानें एक मकाँ में रहना

रंज ओ' मलाल जेवर थे जिंदगी के
वक्त बेवक्त जिन्हें था हमनें पहना

निकल जाऊँगा चुपचाप अकेला मैं
बस कुछ दिन और इसी तरह सहना

© डॉ.अजित

Sunday, June 26, 2016

औसत मनुष्य

देह की थकन देना चाहती है
मन को विश्राम
वो नींद को करती है स्वीकार
बिना किसी परिभाषा के

मन की थकन चाहती है मांगना
देह से कवच कुण्डल
वो लौटा देती है नींद को बिना पता बताए

दोनों थकानों में थकता है
एक मनुष्य
जिसे बाद में कहा जाता है
एक औसत मनुष्य।

©डॉ.अजित

जीवन

जब देखा
शोक से विलाप करती स्त्रियों को
उसने त्याग दिया
आत्महत्या का अपना बेहद पुराना विचार

किसी मदहोश आँख को देखते हुए
शुष्क लबों की बेरुखी को झेलते हुए
भले ही मरा जा सकता हो

मगर
शोकातुर स्त्रियों को देख लगा
किसी भी तरह से मरना ठीक नही
अपनी शान्ति की कीमत
इतनी बड़ी नही हो सकती
कम से कम

इसलिए
उसने कहा स्त्री और जीवन
एक स्वर में
और जीता चला गया
तमाम जीने की असुविधाओं के बावजूद।

©डॉ.अजित

Thursday, June 23, 2016

निजता

उसनें एकदिन पूछा
तुम्हें कभी निजता के संपादन की जरूरत महसूस हुई?
मैंने कहा हां एकाध बार

उसने पूछा कब?

मैंने कहा जब कोई ख्याल
सार्वजनिक तौर पर कयासों की देहरी पर
बेवजह टंग गया
और बहस मेरी रूचि न बची थी

उसे बचाने के लिए निजता को
सम्पादित करना पड़ा है मुझे

अच्छा ! उसने दिलचस्पी से मेरी तरफ देखा
कैसे किया तुमनें निजता का सम्पादन ?

मैंने कहा फेसबुक की तरह
कुछ विकल्प थे मेरे दिल ओ' दिमाग में

मैं कर सकता था उस ख्याल को सीमित
दुनिया से हटाकर दोस्तों तक
दोस्तों से हटाकर खुद तक
या खुद से हटाकर किसी एक दोस्त तक

एक बार सोचा क्यों न परमानेन्ट डिलीट ही कर दूं
फिर लगा ये तो उस ख्याल के साथ नाइंसाफी होगी
 
मुझे निजता और ख्याल दोनों बचाने थे
इसलिए उसको कर दिया सीमित
मेरे और तुम्हारे बीच

जानता हूँ तुम्हें इसकी खबर नही है
मगर मेरी निजता का एक बड़ा हिस्सा
तुम्हारे साथ यूं ही बेखबर रहता है

तुम्हारे साथ शेयर कर सकता हूँ
मैं बेहद मामूली बातें भी

मसलन
कैसे मुझे नया जूता काट रहा था
जींस पर बेल्ट बांधते समय मुझसे एक हुक छूट गया था
या मुझे बहुत देर से पता चला कि बनियान को कैसे समझा जाता है उल्टा या सीधा
शर्ट इन करने के बाद पहली ही सांस के साथ बेतरतीब ढंग से शर्ट क्यों आती है बाहर
पहली दफा जब एटीएम से पैसे न निकलें और मैसेज आ गया था फोन पर अकांउट डेबिट होने का
कितना घबरा गया था मैं
ये भी बहुत दिन बाद जान पाया कि जिस दोस्त के घर बच्चें होते है
नही जाना होता उनके घर खाली हाथ
प्यार से ज्यादा जरूरी होती है अंकल चिप्स,चॉकलेट और फ्रूटी

ये बातें सुनकर वो खिलखिला कर हंस पड़ी
पहली बार यह महसूस हुआ
ये निर्बाध हंसी
हमारी निजताओं की दोस्ती की हंसी थी
जिसे फिलवक्त किसी सम्पादन की जरूरत नही थी।

©डॉ.अजित

मुद्दत से

मुद्दत से मेरे पास कोई ऐसी खबर नही
जिसे सुन मेरे दोस्त खुशी से झूम उठे और
बिना मेरी सहमति के कर ले पार्टी प्लान
और मुझे लगभग चिढ़ाते हुए कहे
बड़े आदमी हो गए हो बड़े अब हमारे लिए वक्त कहाँ !

मेरे पास जो खाली वक्त है
ये उसका सबसे क्रूर पक्ष है

मुद्दत से मेरा कोई रिश्तेंदार
मुझसे मिलनें को लेकर उत्साहित नही है
इंतजार का औपचारिक उलाहना सुनें
मुझे अरसा हो गया
एमए पीएचडी होने के बावजूद कोई नही रखता अपेक्षा कि
उनके बच्चों के करियर पर मैं कोई सलाह दूं
बल्कि यदि बच्चें मेरे इर्द गिर्द इकट्ठा हो जाए
उन्हें फ़िक्र होने लगती है
कहीं वे मुझे अपना आदर्श न मान लें
और ढीठता से सीख न लें
असफलताओं का ग्लैमराईजेशन

मुद्दत से मेरी बातों में नूतनता का नितांत अभाव है
कुछ पढ़ी पढ़ाई सुनी सुनाई बातों के जरिए
बचाता रहा हूँ अपने कथित ज्ञान की आभा
पिछले दिनों एक बच्चें ने सत्रह का पहाड़ा पूछ लिया मुझसे
जब मैंने कहा मुझे नही आता
उसनें इस तरह देखा मुझे
जैसे मैं लगभग अनपढ़ हूँ

कुछ पढ़े लिखे दोस्तों की बातचीत से चुपचाप चुराता रहा हूँ विचार तर्क और मान्यताएं
कविताओं से सीखता रहा हूँ प्रेम को इस तरह पेश करना
जैसे अर्थ से बड़ी दरिद्रता प्रेम की दरिद्रता है
जिनका मैं कर्जमंद हूँ
जब वो पढ़तें है मेरी प्रेम कविताएँ
उनकी खीझ चरम पर होती है
इतने आत्मविश्वास से बोलता हूँ झूठ कि
सत्य को संदेह होने लगता है खुद पर
यह मेरा अधिकतम वाचिक कौशल है

मुद्दत से मैंने खुद से बातचीत नही है
अपने आसपास जमा किया है मैंने इतना शोरगुल कि
न सुन पाऊं दिल या दिमाग की एक भी बात
इसलिए, मैं जो बोलता हूँ वो एक सीमा तक जरूर मौलिक है

मुद्दत से मेरे कुछ शुभचिंतक प्रतीक्षारत है
उन्हें लगता है मेरे अंदर अपार सम्भावनाएं है
बस मैं मन का थोड़ा अस्थिर हूँ
हनुमान की तरह भूल गया हूँ अपना ही बल
एक दिन करूँगा मैं कुछ बड़ा

मैं उनकी मासूम उम्मीदों पर ठहाका मार हंसना चाहता हूँ
मगर हंसता नही
क्योंकि ये अपेक्षाओं का नही मनुष्यता का निरादर होगा
नही कर सकेगा फिर कोई किसी पर भरोसा
नही देख सकेगा कोई साँझे स्वप्न

मुद्दत से यही नैतिकता मेरे जीवन में बचाए हुए है
थोड़ी बहुत औपचारिक प्रतिबद्धता

मुद्दत से 'गुड फॉर नथिंग' जैसे सांसारिक उत्पाद का
ब्रांड एम्बेसडर बना हुआ हूँ मैं
अपनी तमाम थकान के वावजूद
किसी को नही है सन्देह मेरी प्रचार क्षमता पर
मेरी उत्पादकता से षड्यंत्र की बू आती है
बहुधा लोगो को लगता है कि
बहुत से मुरीद बनाए मैं बड़े वली वाले मजे में हूँ

जबकि सच तो यह है
मुद्दत से मैं कहाँ हूँ मुझे खुद नही पता
मैं गुमशदा हूँ या गमज़दा ये बता पाना भी मुश्किल है

मुद्दत से मैं बस जहाँ हूँ वहीं नही हूँ।

©डॉ.अजित

उम्मीद

कल तुम्हें फोन किया
फोन स्विच ऑफ़ बता रहा था

मैंने दोबारा मिलाया तो
आउट ऑफ़ रेंज बताया गया

जो मध्यस्थ मुझे तुम्हारे फोन के बारें में बता रहा था
उसकी आवाज़ इतनी शुष्क थी कि
तीसरी दफा फोन करने की हिम्मत न हुई

हारकर एक एसएमएस किया
मगर उसकी डिलवरी रिपोर्ट नही आई

कल तुम कहां थी
ऐसा बेतुका सवाल नही पुछूँगा
मगर कल जिस जगह तुम्हारा फोन था
वो दुनिया का सबसे भयभीत करने वाला कोना था

हो सकता है ये चार्जिंग पर टंगा हो
या फिर फ्रिज के ऊपर हो
ये तकिए के नीचे भी हो सकता है

खैर कहीं भी हो मुझे क्या
तुम्हारी चीज़ है
मुझे पुलिसिया ढंग से
पूछताछ करने का कोई हक भी नही
मगर कल जब तुमसे बात न हो पाई
और मध्यस्थ पुरुष ने मुझे
दो अलग अलग बात बताई तो

यकीं करो दोस्त !
मैंने खुद से ढ़ेर सारी बातें की
उन बातों में जगह जगह तुम थी

दरअसल, ऐसा करके मैं खुद को भरोसा दिला रहा था कि

फोन ही तो नही मिल रहा है मात्र
तुम एक दिन जरूर मिलोगी
उसदिन तो बिलकुल मिलोगी
जिस दिन तुम्हारी सबसे सख्त जरूरत होगी मुझे

फिलहाल उम्मीद तुम्हारे फोन के विकल्प के रूप में
अपनी मेमोरी में सेव्ड कर ली है
झूठ नही कहूँगा थोड़ा सा डर भी है कि
कहीं तुम्हारे फोन की तरह ये भी किसी दिन
स्विच ऑफ़ या आउट ऑफ़ रेंज न मिले।

©डॉ.अजित

Tuesday, June 21, 2016

ग्रामर

उसकी एक बात ने
प्रेम में हाइफ़न लगा दिया था

मेरी कोई दलील
इंवर्टेड़ कोमा में नही थी

वहां सवाल बिना क्वेश्चयन मार्क के थे
वहां जवाब में कोई कोमा भी नही था

न जाने क्यों एक दिलचस्प बातचीत में उसनें
एक सेमीकॉलम बनाया और आगे लिख दिया
फ्रीडम फ्रॉम द नॉन

मुझे लगा ये किसी फिलासफी की बात है
मगर दरअसल वो फुल स्टॉप की एक भूमिका थी

दोस्ती के ग्रामर में मेरी पंचुएशन खराब थी
इसलिए नही कह पाया कभी ये बात
महज एक शुद्ध वाक्य में
प्लीज़ बी विद मी !
इफ पॉसिबल।

©डॉ. अजित

हसरत

बहुत दिन बाद उसने अपना हाल लिखा
कही पे जलाल तो कहीं पे मलाल लिखा

तासीर ही उस ताल्लुक की कुछ ऐसी थी
अहसास ए हकीकत को भी ख्याल लिखा

जिन दिनों परेशां था आरजू ओ' ज़ुस्तज़ु में
उन दिनों को ही उसने महज कमाल लिखा

मुहब्बतों के खत लिखतें है जमाने के लोग
मगर उसनें अपनी नफरतों का हाल लिखा

माँगा नही जवाब हमनें अपनी हसरतों का
फिर भी सवाल के जवाब में सवाल लिखा

मिलना बिछड़ना गोया तकदीर का खेल था
साथ होना फिर भी हमारा बेमिसाल लिखा

©डॉ.अजित


Monday, June 20, 2016

चिट्ठी

तुम्हारा खत मिलतें ही
मैंने सबसे पहले चाहा एकांत

खत की खुशबू के लिए
मैंने चाहा खुला आकाश

तुम्हारी लिखावट से जब
मिलाना चाहा हाथ
वहां देखा पसरा हुआ संकोच

आखिर में जहां तुम्हारा नाम लिखा था
वहां लगा जैसे तुम बैठी हो
देख रही मुझे यूं अस्त व्यस्त
मुस्कुरा रही हो मंद-मंद

ये महज तुम्हारी एक चिट्ठी नही है
ये एक चिकोटी है
जो काटी है तुमनें मेरी गाल पर
पूछनें के लिए
कैसे हो मेरे बिना इनदिनों

मैं अक्षर गिन रहा हूँ
और तुम्हारी हथेली के स्पर्शों की
छायाप्रति निकाल कर रख रहा हूँ बायीं जेब में
कागज़ की तह से पूछ रहा हूँ तुम्हारा उत्साह
लिफाफे को रख दिया एक उपन्यास के बीच में

पहली फुरसत में लिखूंगा
दिन और रात का फर्क
दूरियों का भूगोल
उधेड़बुन का मनोविज्ञान
परिस्थितियों का षड्यंत्र
विलम्बित होती गई तिथियों का विवरण
कुछ शिद्दत के पुर्जे
कुछ बेबसी के कर्जे

अचानक एकदिन मिलेगी
तुम्हें मेरी चिट्ठी
जिसमें होगा
ज्यादा हाल ए दिल
थोड़ा हाल ए जहां
विश्वास करना मेरा
लिखता अक्सर हूँ
बस पोस्ट नही करता

क्यों नही करता
तुमसे बेहतर मैं भी नही जानता।

©डॉ.अजित

Sunday, June 19, 2016

वजह

कारण चाहे जो भी रहे हो
जो बच्चें लौकिक रूप से
सफल न हो पाए
नही दे पाए अपने पिता को
गर्व की एक भी वजह
बल्कि सुननी पड़ी हो
नसीहतें जिनके कारण
होना पड़ा हो शर्मिंदा पिता को गाहे बगाहे

माँ जिनके कारण
कोसती रही हो अपनी ही कोख को
कहती रही वो ऐसे सपूती से तो वो नपूती भली थी

भाई जिनके कारण छिपाते रहे हो अपना कुल
धारण करते रहे हो घर के मसलों पर चुप्पी
अजनबीपन जीने का कौशल बनाना पड़ा हो

बहन तलाशती रही हो
ममेरे फुफेरे भाईयों में अपनत्व
सदा शामिल रही हो
माँ बाप के औलाद वाले दुःख में बढ़ चढ़कर

ऐसे उपेक्षित बेकार समझें गए बच्चों से
जब दोस्ती की गई
यकीन मानिए वो कमाल के दोस्त साबित हुए
यारों के यार
आधी रात भी साथ खड़े होने को तैयार

उनसे किसी ने नही पूछा
उनके जीवन का खेद
असफलता का बोझ
और यूं ही बेवजह बर्बाद होने का सबब

जब एकदिन मैंने पूछना चाहा किसी एक से
वो हंसकर टाल गया
जातें जातें उसने एक बात कही
जो फंसी रह गई मेरे दिल में
फांस की तरह

'कुछ क्यों ऐसे होते है जिनका कोई जवाब नही होता है'।

© डॉ.अजित

Saturday, June 18, 2016

विज्ञापन

मैंने एकदिन पूछा
तुम्हारे हिसाब से
सबसे झूठा विज्ञापन कौन सा है
उसनें कहा
'हीरा है सदा के लिए'
मैंने वजह जाननी चाही क्यों?
थोड़ी दार्शनिक मुद्रा बनाकर उसने कहा
प्रत्यक्ष को प्रमाण की जरूरत नही होती

फिर एकदिन मैंने आदतन पूछ लिया
तुम्हारे हिसाब से
सबसे सच्चा विज्ञापन कौन सा है
उसने कहा
सच्चा तो नही पता मगर सबसे अच्छा विज्ञापन है
गार्नियर का
'अपना ख्याल रखना'
मैंने कहा क्यों?
खीझते हुए उसने कहा
ये मेरी दिन रात की फ़िक्र और प्रार्थना बताता है।

©डॉ.अजित

Friday, June 17, 2016

प्यार

प्यार शहतूत था
जहां गिरता मिठास बो देता था
प्यार कुछ कुछ हिस्सों में प्रलय जैसा था
सब कुछ खतम की उम्मीद में भी
छोड़ जाता था कुछ वीरान टीले
प्यार एक मुकम्मल सफर था
दो साथ चले लोगो को उतरना था
अलग अलग मंजिलो पर
प्यार मुमकिन करता था
रात में इंद्रधनुष देखना
और दिन में चांद
प्यार में यार के माथे पर
एक अधूरा लफ्ज़ टँगा था
इसलिए अधूरेपन से प्यार को भी था प्यार
प्यार बताता था फर्क करना
ख्वाब और हकीकत में
प्यार मदद करता था
बेहतर इंसान होने में
प्यार की बस एक ही अच्छी बात थी
इसके सहारे मुस्कुराया जा सकता था
चरम अवसाद के बीच
प्यार की बस एक ही खराब बात थी
ये बिन बताए आता
और जाता था हमें
ठीक ठाक ढंग से बताकर।


©डॉ.अजित

Thursday, June 16, 2016

बेबसी

एक दरख्वास्त
तुम्हारी बेरुखी की दराज़ में
सबसे नीचे मुद्दत से रखी है

एक इस्तीफ़ा तुम्हारी मेज़ के कोने पर
नामालूम नाराज़गी के पेपरवेट तले दबा
अरसे से फडफड़ा रहा है

एक खत तुम्हारे डस्टबिन की मुहब्बत में
कुछ महीनों से गिरफ्तार है
स्याही की गोंद बना वो उसके दिल से चिपक गया है

एक बोसा तुम्हारी पलकों
की महीन दरारों में दुबका बैठा है
उसे डर है तुम्हारे आंसू उसका वजूद न खत्म कर दे

एक शिकायत
गंगाजल में जा मिली है
रोज़ आचमन के समय तुलसीदल के साथ
तुम उसे घूँट घूँट पीती है
मगर तुम्हें इसकी खबर नही है

कुछ मलाल तुम्हारे लॉन की घास के साथ उग आए है
वो रोज़ तुम्हारे नंगे पाँव के सहारे
तुम्हारे दिल में दाखिल होना चाहतें है
मगर तुम उन्हें खरपतवार समझ उखाड़ देती हो

कुछ बहाने,कुछ सात्विक झूठ और कुछ सफाईयां
रोज़ तुम्हारी चाय के कप के इर्द गिर्द भटकती है
तुम जैसे ही फूंक मारकर चाय से मलाई हटाती हो
वो उस तूफ़ान में भटकर
धरती के सबसे निर्जन कोने में पहूंच जाते है

तमाम कोशिशों के बावजूद भी
तुम्हारे वजूद में
नही दाखिल हो पा रहा है मेरा वो हलफनामा
जिसमें कहना चाह रहा हूँ
इस वक्त मुझे तुम्हारी सख्त जरूरत है
वक्त की चालाकियों में मिट रहें हरफ
बस एक लफ्ज़ बचा पाया हूँ बड़ी मुश्किल से

'ईश्वर मेरी मदद करें'।

©डॉ.अजित

Sunday, May 29, 2016

वो

उसकी सबसे अच्छी बात ये थी
प्रेम संवेदना और मौन समझ के बावजूद
नही मरने दी उसने अपनी मौलिकता
बचाए रखा अपना विचार हमेशा
नही मिलाई हमेशा मेरी हां में हां
उसके लिए मैं नही था सबसे सुपात्र व्यक्ति
ये अलग बात थी
वो किसी की तलाश में नही थी
वो आँख में आँख मिलाकर बता सकती थी
मेरे तमाम ऐब
जब वो स्पष्ट बोलती तो साफ नजर आता था
स्पष्ट और कड़वे बोलने का फर्क
उसने प्रेम और अधिकार के समक्ष
कभी गिरवी नही रखा अपना विवेक
उसके पास था असहमति का नैतिक बल
साथ ही
विचार और संवेदना का अद्भुत संतुलन
विमर्श को बना सकती थी वो कविता
और कविता में तलाश लेती थी वो विमर्श
उसके पास था कौशल
बिना व्यक्तिगत हुए भी लम्बी बहस करने का
वो उदासी के पलों में ऐसी कल्पना कहती
हंस पड़ता था मैं
निर्जीव वस्तुओं पर कमाल का था उसका व्यंग्यबोध
मानों जानती हो उनकी अंदरुनी दुनिया करीब से
वो जानती थी
अस्तित्व का मूल्य
प्रेम की जरूरत
और मनुष्य की कद्र
इसलिए
बेहद कम समय के लिए मिल पाए हम
वो इर्द गिर्द के लिए
विस्तार के लिए बनी थी
उसको जीया जा सकता था बस
समझ तो वो न तब आती थी
और न आती है अब।

©डॉ.अजित

Friday, May 27, 2016

बातें

चलो उन दिनों की  कुछ बातें करतें है
जब सीख रहें थे सम्बन्धों के
सबसे कोमल षड्यंत्र
जब देख रहे थे
धरती के नीचे बहती नदी का सागर से मिलन
जब बना रहे थे
बादल और चाँद के बीच एक ठिया
ताकि बरसात में पी जा सके साथ चाय
जब शिकायतों को भेजतें थे व्यंग्य की शक्ल में
और उड़ाते थे वायदे बनाकर

चलो उन दिनों की कुछ बातें करते है
जब याद रहता था हमें हमेशा
एक दूसरे का
जन्मदिन
पसंदीदा कपड़े
और पसंदीदा खाना
जब रास्तों को पता होता था हमारे स्लीपर का नम्बर
दरख़्त जानतें थे हमारी काया का व्यास
पक्षी आपदा और मौसम की घोषणा करते थे
देखकर हमें साथ-साथ

चलो उन दिनों की कुछ बातें करते है
जब मनुष्य का मनुष्य पर बचा हुआ था भरोसा
प्रेम था दुनिया का सबसे साहसी काम
विश्वास था जब परीक्षण से मुक्त
सन्देह था जब सबसे उपेक्षित
हमारा साथ था जब सूरज सा शाश्वस्त

चलों उन दिनों की कुछ बातें करतें है
जब हवा बहती थी हमारे पसीने के आग्रह पर
बादल आतें थे तुम्हारे चेहरे की शिकन देखकर
बारिश होती थी हमें अकेला देखकर
फूल मुरझा जातें थे तुम्हें उदास देखकर
तितलियाँ उड़ जाती थी हमारी निजता सोचकर

चलों उन दिनों की कुछ बातें करतें है
चौराहों के पास होते थे अफवाहों के खत
गलियों के पास होता था जल्दबाजी का मनीऑर्डर
रास्तें अपने अपनी प्रेमिका को दिखाते थे हमारी शक्ल
धूप जब आती थी डेढ़ घण्टा विलम्ब से
साँझ जब होती थी पौने दो घण्टें पहले
दिन और रात छोड़ना चाहते थे
कुछ घण्टे कुछ मिनट न जाने किसके भरोसे

चलो उन दिनों की कुछ बातें करते है
क्योंकि
जब केवल बातें बच जाती है
उन्हें दोहरा-दोहरा कर ही करना होता है खतम
बातों का बच जाना
मनुष्य के बच जानें से कम खतरनाक नही है
इसलिए कह रहा हूँ लगातार
चलों उन दिनों की कुछ बातें करतें है।

©डॉ.अजित

Wednesday, May 25, 2016

कौतुहल

बहते जल की छोटी सी धारा में
बनता है एक छोटा भवँर
मुझे याद आती है
तुम्हारी नाभि
भँवर में समा जाता है
शाख से टूटा एक पत्ता
तब मुझे याद आती है
अपने कान की प्रतिलिपि
जो समा गई थी तुम्हारी नाभि में
मगर भँवर की तरह नही
बल्कि उस बच्चे की तरह
जो रेल की पटरी पर कान लगा
सुनता है रेलगाड़ी आने की ध्वनि
मेरी और उस बच्चे की मुस्कान में
कोई ख़ास अंतर नही था
वो आश्वस्ति से भरा था
और मैं एक कौतुहल से।

©डॉ.अजित

Tuesday, May 24, 2016

असुविधा

एक स्त्री कहती है
तुम्हारी वजह से
मैंने आत्महत्या को स्थगित कर दिया

एक स्त्री कहती है
तुम्हारी वजह से
एक दिन आत्महत्या कर सकती हूँ मैं

एक स्त्री कहती है
तुमनें जीवन का सच जान लिया है

एक स्त्री कहती है
सच ये है तुम बेहद डरपोक और भगौड़े हो
बस प्रतीत नही होने देते

एक पुरुष कहता है
तुम और बेहतर हो सकते हो

एक पुरुष कहता है
तुम कितने खाली और बेकार हो

एक बुजुर्ग कहता है
तुम आदमी काम के हो
मगर गलत वक्त पर पैदा हुए हो

एक बुजुर्ग कहता है
तुम दोषी हो
तुमनें रास्तों को मंजिल का सही पता न दिया

एक बच्चा कहता है
आपके जूते के फीते खुले है
शर्ट का एक बटन सही बंद नही है

एक बच्चा कहता
आपसे डर लगता है
आप हंसते कम हो

एक धर्म कहता है
ईश्वर एक है
वो दयालू है

एक धर्म कहता है
सब ईश्वरों का भी एक ईश्वर है
उसे नही मानोगे तो
तुम्हें दंड मिलेगा वो

इन सबसे एक
निरुपाय मनुष्य कहता है
हो सके तो
मुझे माफ़ करों

क्षमा का याचन पलायन नही
तटस्थता का अभिनय भी नही

दरअसल,
माफी मांगना एक सुविधा है
उनके लिए
जिन्होंने जीवन में चुनी हमेशा
असुविधा।

©डॉ.अजित 

Sunday, May 22, 2016

एक मेरे पिता थे
जो यदा-कदा कहतें थे
तुम्हारे बस का नही ये काम

एक वो है
जिनका पिता मैं हूँ
उनकी अपेक्षाओं पर जब होता हूँ खारिज़
ठीक यही बात कहतें वो
आपके बस का नही ये काम

दो पीढ़ियों के बीच
इतना मजबूर हमेशा रहा हूँ मैं
ये कोई ग्लैमराइज्ड करने की बात नही
ना अपनी काहिली छिपाने की
एक अदद कोशिश इसे समझा जाए

बात बस इतनी सी है
मैं चूकता रहा हूँ हमेशा बेहतर और श्रेष्ठतम् से
नही कर पाता
कुछ छोटे छोटे मगर बुनियादी काम
और मनुष्य होने के नातें
ये एक बड़ी असफलता है मेरी
यह भी करता हूँ स्वीकार

अपने पिता और पुत्रों के मध्य
संधिस्थल पर बैठा प्रार्थनारत हूँ न जाने कब से
घुटनों के बल बैठे बैठे मेरी कमर दुखने लगी है
मेरा कद  रह गया है आधा

इसलिए नही देख पाता
अपने आसपास बिखरी
छोटी-बड़ी खुशियों को

मेरे वजूद का यही एक ज्ञात सच है
जो बता सकता हूँ मैं
अपने पूरे आत्मविश्वास के साथ।

©डॉ.अजित

Saturday, May 21, 2016

जीभ

शास्त्र के हिसाब से
देखा जाए तो
तुम्हारी जीभ पर
सरस्वती का वास है
मगर मेरे हिसाब से
वहां किसी का वास नही
वो तुम्हारे देह की सबसे मुक्त मांसपेशी है
जो जानती है देह से बाहर की यात्रा
प्रेम और गरिमा के साथ
तुम्हारे होंठों उसका भार कृतज्ञता से भरा है
वो समझती है स्पर्श का मनोविज्ञान
लौकिक और अलौकिकता से परे
शब्द,अर्थ, स्पर्श और यात्रा के जरिए
वो सहेजे है बेहद निजी
मगर उतने ही पवित्र प्रसंग
तुम्हारी जीभ महज वाणी का एक अंग नही
बल्कि चैतन्यता का एक अमूर्त आख्यान है
जो छपा है दिल ओ' दिमाग के ठीक बीचोबीच।

© डॉ.अजित

जलसा

अहसासों की एक जुम्बिश 
रोज़ शाम पीछा करती है
सफहों पर रक्खे कुछ लफ्ज़
हाशिये की बेरुखी से इल्तज़ा करते है 
तुम्हारी पोशीदा हथेलियों के टापू पर 
एक दरिया रोज़ मुझे बुलाता है 
वो चाहता है मैं डूब भी जाऊं और खुदकुशी भी न हो 

हवाओं ने तुम्हारी जुल्फों को पहरेदार बना दिया है 
वो आँखों के काजल को आंसूओं से सूखता देखती है
बादलों ने मेरे खत जला दिए है 
सूरज आजकल उनसे रोशनी उधार मांगकर ज़मी पर आता है 

तुम थोड़ी मुतमईन थोड़ी गाफिल होकर 
जब मुस्कुराती हो
कायनात तब अपने छज्जे से कुछ पंछी उड़ा देती है 
आसमान की बालकनी में 
एक गीला तौलिया टंगा है धूप उसकी तलाश में
मेरे घर की तलाशी लेती है 
वहां महज तुम्हारे ख्यालों की महक मिलती है तुम नही 
इस बात पर धूप मुझे ताना देती है
मुद्दत से मैं अंधेरो में जीता हूँ 
खुद की धड़कनों को तुम्हारे ख्याल के तबस्सुम से सीता हूँ

अजब सी कशमकश है 
मरासिम की एक वसीयत मेरे सिराहनें रखी है 
और मैं शिफ़ा के नुस्खे तलाश रहा हूँ 
चाँद तारों से तुम्हारी करवटों का हिसाब ले रहा हूँ 
वो खबरी नही है फिर भी मुझे बताते है 
तुम्हारे तकिए की बगावत के किस्से
और हंस पड़ते है 

इनदिनों, तुम्हारा जिक्र मैं उन रास्तों से करता हूँ 
जो अब कहीं नही जातें है 
वो मुझे कोई मशविरा नही देते नसीहत भी नही
बस मेरे पैर को चूम लेते है

आख़िरी चिट्ठी मुझे तुम्हारी अंगड़ाई की मिली थी
जिस पर लिखा था 
तुम याद आएं और मैं मुस्कुरा पड़ी

इन्ही तसल्लियों पर आजकल जिन्दा हूँ 
जिन्दा हूँ मगर एक ख्वाब की तरह
तुम दूर हो उस हकीकत की तरह
जिसकी रौशनी में 
हमारी पीठ एक दुसरे के सहारे टिकी है 

उदासियों का उर्स है
मैं खताओं की कव्वालियां गा रहा हूँ 
मेरे मुर्शिद ने मुझे सरे राह छोड़ा क्यों 
मुरीद का तमन्नाओं से दिल तोड़ा क्यों

खता का इल्म वफ़ा के अदब से भारी है
जमीं के जिस हिस्सें में तुम नही 
आजकल वहीं अपनी परदेदारी है।

©डॉ. अजित

मोक्ष

एक दिन ये देश छोड़ना चाहता हूँ
और एक दिन ये दुनिया
दुनिया और देश के अलावा भी
निर्वासन के लिए जगह तलाशता हूँ

जब कहीं की नागरिकता नही मिलती
मैं भटकता हूँ ब्रह्माण्ड में
किसी आवारा उल्का पिंड की तरह

मेरा नष्ट होना महज प्रकाश का चमकना नही होगा
मैं फ़ैल जाऊँगा राख की शक्ल में
उस द्वीप पर
जहां कोई स्त्री नही रहती

खरपतवार की पत्तियों पर नसीब होगी
मुझे आखिरी नींद
प्रेम का गल्प बनेगा
मेरे मोक्ष का एक शास्त्रीय प्रयोजन

इस तरह से खतम होगी मेरी
शून्य से शून्य की यात्रा।

©डॉ.अजित