Monday, August 25, 2014

दस: और बस !

दस: .....और बस !
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बीमार तन
भटकता मन
तुम्हें शिद्दत से याद करता है
तुम मतलबी ठीक कहती हो
मुझे।
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मेरे तुम्हारे बीच में
संदेह का जंगल है
विश्वास की नदी है
नगें पाँव आ सको तो
आ जाओ।
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तुम्हें सोचते अक्सर
ये ख्याल आता है
जब मिलना ही था
तो इतनी देर से
क्यों मिली
शायद अधूरेपन की
कोई सिद्ध प्रमेय हो तुम।

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तुम हंसती हो तो
तारे सूरज से बगावत कर बैठते है
तुम्हे हंसते हुए देखना
दिन में तारे देखने
जैसा है।
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मेरे माथे की रेखाएं
तुम्हारी हथेली तक फ़ैली है
गौर से देखना कभी
ये कुछ आड़ी तिरछी पगडंडियाँ है
कमबख्त ! इनमें से
एक भी तो तेरे घर तक नही जाती।

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मेरे तुम्हारे नाम में
कोई दशमलव
क्यों नही आता
इसी बहाने
पूरे हो सकते थे हम।
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कल चाँद उदास था
वजह पूछी तो कहने लगा
इन दिनों तुम
आईना देखने लगी हो
बहुत
मै हंस पड़ा
अब चाँद मुझसे भी नाराज़ है।
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कल तुम्हारे
तकिए ने शिकायत की
वो सूखा है कई दिनों से
झूठा ही सही
याद करके रो लिया करों
कभी-कभी।
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तुम्हारी लिखावट
तुम्हारे स्पर्शो जितनी
साफ़ और घनी है
तुम्हारे खत
इसलिए नही जला पाया
आज तक।
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तुम्हारे आंसू
मीठे है
आचमन के जल से
तुम्हारी प्रार्थना काफी है
यकीन करने के लिए
कि ईश्वर है
यह बात एक नास्तिक कह रहा है।

© अजीत

3 comments:

रश्मि प्रभा... said...

बहुत ही प्रभावशाली रचना

सुशील कुमार जोशी said...

बहुत खूब हमेशा की तरह :)

bhawna gupta said...

बहुत खूब