Friday, August 1, 2014

आभार

तुम्हारे तिरस्कार ने
मृत अह्म को पुनर्जीवित किया
तुम्हारी घृणा ने
अंतरनिरिक्षण के लिए प्रेरित किया
तुम्हारे संदेह ने
सच को दृढता से कहने की हिम्मत दी
तुम्हारे आरोपों ने
तर्क शक्ति को मजबूत किया
तुम्हारे झूठ ने
झूठ से लड़ना और सच के लिए अडना सिखाया
तुम्हारे मिथ्याभिमान ने
अस्तित्व की लघुता का बोध कराया
तुम्हारे चटखारे युक्त षड्यंत्रो ने
निर्लिप्त रहना सिखाया
तुम्हारे क्रुर सवालों ने
अंदर का लिजलिजापन मिटाया
तुम्हारे बाह्य आकर्षण ने
आत्मकेंद्रित होने का अवसर दिया
तुम्हारी जिद ने
अड़ने की कमजोरी का पता दिया
तुम्हारे विकल्पों ने
संकल्प का मूल्य बताया
तुम्हे शायद ही कभी पता चलेगा
तुम्हारे बेहद सतही प्रयोगों ने
एक सांसारिक व्यक्ति को
जो विश्वास को पूंजी समझता था
प्रेम को अनुरक्ति
और दुनिया को भोली
उसको तुमने
लगभग चलता फिरता सिद्ध बना दिया है
आभार और कृतज्ञता छोटे शब्द है
तुम्हारे प्रतिदान के लिए
प्रेम,मैत्री और अनुराग की
ऐसी दुर्लभ परिणिती के लिए
हृदय की गहराइयों से
तुम्हारा आभार बनता है
अस्वीकृति की अपनी आदत में
इसे खुले दिल से स्वीकार करों
यह तुम्हारी विजय का प्रतीक है
इसे अपनी हार मत समझना
यही अंतिम अनुरोध है।

© अजीत

1 comment:

Misra Raahul said...

बहुत उम्दा अभिव्यक्ति।
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