Wednesday, April 1, 2015

भरम

जनवरी इक्कीस थी शायद
जब तुम्हें देखा ही नही
महसूस किया था
अप्रैल एक है आज
जब दिमाग को बेवकूफ बनाना चाहा
तुम्हारे अपरिहार्य होने के भरम से
दिल फ़रवरी चौदह में ही अटका रहा
पिछले तीन महीनें
बीते हुए तीन युग थे
आज कलयुग का
पहला दिन है मेरा
शुभकामना नही दोगी !
***
अप्रैल
इस बार थोड़ा ठंडा है
मौसम भूल गया है अपना चरित्र
रिश्तों के वातानुकूलित कक्ष में
टंगी है एक खूबसूरत पेंटिंग
एकदम अकेली
मैं धूप में बादल खोजता हूँ
तुम छाँव में धूप।
***
साल दो हजार पन्द्रह
महीना फरवरी
शिलालेख की तरह दर्ज है
जेहन में
इतिहास बनने से पहले
मनोविज्ञान का हिस्सा होता है
हर किरदार
इतिहास बनना संभावनाओं का
मर जाना है शायद
इसलिए
रिश्तों का दस्तावेज़ीकरण
दुनिया का सबसे मुश्किल काम है।
***
तीन महीनें
या बारह हफ्ते
दौड़ता हूँ समय के विपरीत
और खुद के समानांतर
पहूंचता कहीं भी नही
यात्रा एक भरम है या फिर
मेरी गति अपेक्षित नही
चौथा महीना आते ही
हंसता है मेरी चाल पर
मेरे पैरों में
दो अलग नम्बर के जूते देखकर
जिनके फ़ीते बंद है।

© डॉ. अजीत



1 comment:

Dilbag Virk said...

आपकी इस प्रस्तति का लिंक 02-04-2015 को चर्चा मंच पर चर्चा - 1936 में दिया जाएगा
धन्यवाद